
स्वामी केशवानन्द
02-04-26 | 5:00 प्रातः काल
भाग 1 – तुम्हारी अद्वितीय स्मृति तुम्हारे लिए ईश्वर का वरदान, ईश्वर प्रेम के बदले
“ये शब्द तुम्हारे द्वारा कहे गए हैं मृत्यु के कुछ क्षण पहले – “अभी नहीं तो कभी नहीं, यह संसार अति क्षणभंगुर है।” तुमने प्रत्येक यातना सही और अपना संकल्प अटल बनाए रखा। ऐसा किसी के साथ तब होता है जब उसे परमात्मा सर्वाधिक प्रिय हो।
तुम्हारी आत्मा जानती थी कि तुमने ईश्वर प्रेम, जो अविनाशी है, उसे पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी प्रत्येक जन्म में। इस जन्म में तुमने तुम्हारे अनेक जीवन की स्मृति, अपनी कठोर तपस्या करने के बदले में, कृपा के रुप में परमात्मा से सप्रेम भेंट पायी है।
ईश्वर से कर्म-फल देने में कोई गलती नहीं होती है। तुमने प्रत्येक पल इस जीवन का उनके प्रति पूर्ण निष्ठा व सच्चाई से जिया है। भीषण कठिनाई में भी परमात्मा का न्याय तुम्हारे प्रति कभी शंका के कटघरे में नहीं आया है। केवल प्रतीक्षा की है तुमने।
प्रतीक्षा की है सत्य जानने के लिए, वह सत्य जो ईश्वर द्वारा हमारे लिए कल्याणकारी होता है, पूरे समाज व जगत के लिए लाभदायी होता है। तुम अपनी आत्मा की आवाज़ सदा सुनती हो चाहे उसका पालन करने का दूर तक कोई सहारा या कारण दिखाई नहीं दे रहा हो।
तुम्हारे मन ने शुरू से ‘ईश्वर-इच्छा पर चलना है’ इसकी शपथ खा ली थी, वही शपथ पर तुम अभी भी जी रही हो। कृपा के रुप में सार्थक समय आने पर बिना कभी भूले, परमात्मा तुम्हारे सामने वे सारे रहस्य खोल देते हैं जो तुमसे उन्होंने छुपा लिए थे, वर्षों या जन्मों पहले।
पिछले एक महीने में तुमने न जाने कितने छुपे रहस्य अपने अनेक जीवन के जान लिए हैं। पिछले जन्म का तो रहस्य तुम्हें सबसे अधिक पीड़ा, रुदन व आत्म-बोध दे गया है क्योंकि तुमने मृत्यु का सामना वीरांगना होकर किया था। परन्तु एक क्षण के लिए तुम्हें परमात्मा पर शंका नहीं हुई थी।
मैंने तुम्हें इन दिनों में अनेकों बार छटपटाते देखा है, क्षोभ से भरी पाया है। सत्य की अंतिम सतह तक तुमने अपने जीवन को देखा, फिर से सारे अनुभव लिए मृत्यु काल के। अपने सारे विचारों व संकल्पों को फिर से देखा, वे कब और किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुए थे और अन्त में हुआ क्या था?
इन स्मृतियों को तुमने ईश्वर के चरणों में डाल दिया और कहा, “जिन कारणों से आपने मुझ में ये स्मृतियाँ अकस्मात जगाईं हैं, वह सत्य को मैंने समझ लिया, जान लिया है। मेरी आत्मा सन्तुष्ट हुई है क्योंकि परमात्मा द्वारा मुझे दिया सत्य मुझे सर्वप्रिय है, वह आशीर्वाद है।
मैंने उस अतीत को मिटा दिया जहाँ पर घोर पाप व अन्याय मेरे परिवार के साथ हुआ था परन्तु मैं उस अनुभव से एक अटूट, अखंड व अचल संकल्प लेती हूँ – “भारत की सोई हुई आत्मा को जगाने में मैं अपना योगदान सम्पूर्ण दूँगी। मैं अब पीछे कभी नहीं हटूँगी। मैं ऋषियों को विश्व में प्रकट करके ही रहूँगी!
मेरे मन के धैर्य व सहनशीलता के कोने बन्द हो गए हैं, मैं अब प्रत्येक दिन वह तैयारी करूँगी जिससे मेरा मनोबल सौ नहीं, पाँच सौ प्रतिशत बढ़े। मेरे प्रत्येक संकल्प के पीछे परमात्मा की शक्ति व आशीष हो। मैं अब वह सब बातों को कल्पना शक्ति द्वारा यथार्थ करूँगी जो प्रभु इच्छा है।
मेरे लिए परमात्मा ने इस युग-काल, घड़ी या अवसर के लिए जो भी सोचा है, उन्होंने हिरण्यगर्भ में एक स्त्री के भविष्य के लिए सुविचार संजोए रखे हैं, वे सब का मैं अभिनंदन करती हूँ। अब वे सारे संकल्प मेरी इच्छा हैं, वे सारे शुभ कार्य मैं अवश्य करूँगी।
पूर्ण सत्य जानने के बाद भला मैं क्यों अब थमूँगी? मैं पृथ्वी के आखरी छोर तक जाऊँगी उन शुभ संकल्पों को सत्य करने में। मेरी अद्वितीय स्मृति, ईश्वर प्रेम और साहस मेरे जीवन को एक नई दिशा, अर्थ व संकल्प शक्ति एवं इच्छा शक्ति को जन्म दे चुके हैं। अब ये सारे कार्य मुझसे होंगे।”
भाग – 2 अद्भुत प्रेरणा तुम्हारी अनेक जन्मों की तपस्या का फल विश्व कल्याण के हेतु। तथास्तु!
“तुम्हारे प्रत्येक अति शुभ संकल्प पर परमात्मा ने तथास्तु कहा है। कल रात्रि मुझे सन्देश आया, “जाओ उस पुण्यात्मा को, महान आत्मा को ब्रह्म मुहुर्त में उठाओ और 5:00 बजे उससे एक विशेष लेख लिखवाओ। मैं जानता हूँ वह अस्वस्थ है, थकान से चूर-चूर है।
मैं यह भी भली भाँति जानता हूँ कि आज विश्व में किसी भी स्त्री का संकल्प मेरे प्रति इतना दृढ़ नहीं है। वह विश्व में सबसे अलग है। मैंने इस जीवन में उसकी परीक्षा के लिए इतना घाटा कराया कि कोई सहन नहीं कर सकता है। उसने धैर्य और मेरे प्रति सर्वोपरि आस्था रखी।
मैंने उसे फौलाद जैसी मजबूत स्त्री बनाने के लिए उसके सारे सहारे एक-एक करके हटा दिए। उसने आधार खिसकने से पहले ही मन से, शरीर से तैयारी कर ली और निर्मोही बन गई। वह मन में त्यागी, वैरागी है। एक पल में वह राजपाट त्याग कर चुकी है, पलट कर भी नहीं देखती है।
मैंने उससे अकस्मात वे-वे कार्य करवाएँ हैं जिसकी उसने कभी चाह भी नहीं की थी, कल्पना में भी नहीं थे वे। उसने हर बात के लिए केवल दो छोटे शब्द मन में खुद से कहे हैं – “मैं करूँगी” अगले पल वह उस कार्य की तैयारी में जुट गई है। किसी भी अवसर पर उसके मन में प्रश्न नहीं उठता है – क्यों?
न क्षमता, न धन, न सामग्री, न सहारा और जिसके पास भाग्य भी जीवन में सबसे मंदा हो, मैंने ऐसे समय पर उसकी कड़ी सी कड़ी परीक्षाएँ ली हैं। उसने केवल कहा, “अवश्य होगा, मैं करूँगी” कोई एक मनुष्य पूरे संसार में नहीं है जो मन पर पत्थर रखकर, संसार से विमुख होकर मुझे उच्चतम स्थान दे।
2018 के बाद का समय इसके जीवन, पृथ्वी व ब्रह्माण्ड के लिए महत्वपूर्ण था। मैंने इसको अति कठिन परिस्थितियाँ दी जिससे इसका प्रशिक्षण त्रुटिरहित हो जाए और यह ऋषियों को समय आने पर विश्व में प्रकट कर सके। ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है जिसका यह सामना नहीं कर सकती है।
25 फरवरी 2026 सांय 6:22 मिनट पर इसने तुम्हारा तर्पण वृंदावन में किया है।” “6:33 मिनट पर परमात्मा ने मुझसे कहा”, “लो इसको संभालो, मैंने इसको पूरा तैयार कर दिया है विश्व में इसे प्रकट करने के लिए। अब यह गर्जना करेगी, यह घायल शेरनी है, इसने बहुत अत्याचार सहे हैं।
यह विश्व का कल्याण करेगी। विश्व में मैंने पहली बार किसी को अपना प्रतिनिधि बनाया है। इसको सब बहुत ध्यान से सुनो और देखो। इसके प्रत्येक लिखे शब्द से संसार में अन्तर आएगा, इसके प्रत्येक शब्द मुख से निकले, मेरे दिए हैं। उनसे हर दिशा में ॐ व ब्रह्म प्रकाश फैलेगा।
यह अपने आचरण, चरित्र, लेख, प्रवचन और जीवनी से समाज को सुधार रही है। इसके जीवन में सैलाब आया है। 26–02–26 के दिन शाम 6:24 मिनट से मैंने इसके 1,000 करोड़ पुण्य इसकी सुरक्षा, यश, तप, कीर्ति व प्रताप के लिए छोड़ दिए हैं, इसे अब बता रहा हूँ।
इसे अब कोई नहीं रोक सकता, न छुपा सकता है या इसके साथ कोई चाल चल सकता है। सदा यह ही विजयी होगी। इसके आगे सभी को निरुत्तर होना पड़ेगा, इसकी बात सत्य निकलेगी। 26 वर्षों से जमा किए गए 1,000 करोड़ पुण्य मैंने एक-एक करके अपने पास आज के दिन के लिए रखे थे।
इनका लाभ इसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य, अपूर्व स्मृति, सफलता, यश और लम्बी आयु के लिए मैंने अलग से रखे थे ताकि यह अपने देश को विश्व में गौरव व मान-सम्मान दिला सके। यह देशभक्ति करती है लेकिन मन में चुप रहती है। पृथ्वी की पूजा करती है मन में सदा से।
मेरी परम भक्त पुत्री को ज्ञात है कि यह जीवन क्षण-भंगुर है। इसे काल की गति का खूब बोध है। यह समय के पैरों की चाप सुन लेती है। यह सदा शान्त परन्तु सतर्क है। जैसे ही इसके जीवन में अनुकूल अवसर आता है यह उसे प्रभु कृपा मानती है – इसे देखो, यह मेरी बनाई हुई मेरी कृपा की मूर्ति अद्वितीय, अतुलनीय है।”
ॐ
