On Guru Purnima
29-07-26

Thursday | 23-07-26 | 6:55 AM
भाग 1 – तुमने ब्रह्म का निनाद सुना !
“कल रात से तुम बेचैन हो; तुम्हें मैंने लघु रुप में अपनी आत्म-कहानी दो दिन तक सुनाई है। तुम्हारा अति कोमल मन दुःखी है यह जान कर कि एक छोटी भूल के लिए मैंने ईश्वर से इतना कठिन प्रायश्चित क्यों दान में माँग लिया था?
तुम जैसी पवित्र आत्मा आज तक धरती पर न हुई है, न कभी होगी। तुमने सर्वप्रथम जन्म ऋषिकेश में कुछ क्षण पहले लेते हुए ब्रह्म की अनुभूति की थी; वह शान्ति और प्रेम में की थी। उस क्षण तुमने ईश्वर से कहा, “हे प्रभु, मुझे अपने से अलग न करें।”
किसी भी जीवात्मा को पहली बार जन्म देने से पहले, परमात्मा कम से कम 22½ सेकण्ड के लिए अपने किसी भी स्वरूप का दर्शन कराते हैं, जिस से हम भविष्य में अपनी नाभि से आकाश व पृथ्वी से कभी भी अलग न हों। ये दो तत्त्व भविष्य में महत्वपूर्ण होते हैं।
अधिक से अधिक जीवात्माएँ जन्म लेने के लिए, भौतिक शरीर में प्रवेश करने के लिए इतनी व्याकुल और अधीर हो जातीं हैं कि वे सर्वप्रथम जन्म से ही परमात्मा का अति शीघ्र त्याग और माया से मन को एक अदृश्य धागे से सदा के लिए बाँध लेतीं हैं।
तुमने ऐसा कदापि नहीं किया। तुमने ईश्वर के प्रेम और उनकी दी हुई अविरल शान्ति को पूर्ण रूप से स्वीकार किया। वे कुछ क्षणों में तुम्हें आभास ही नहीं था कि तुम्हारे पास एक विकल्प और है, “मैं शीघ्र जन्म लेकर इंद्रिय सुख भोगूँ।”
उन कुछ क्षणों में तुम्हारे साथ क्या हुआ? तुमने एक विशेष स्पंदन को प्रतीत कर लिया। वह ईश्वर, ब्रह्म के मुख से, कभी निकल गर्भ में पड़ा एक अति उत्तम अलौकिक संकल्प था। वह गूँज रहा था, एक संगीत को तुमने सुना था।
जैसे किसी ने तुम्हें पुकारा हो, अपने पास बुला रहा हो, तुम्हें मन न होते हुए भी प्रतीत हो गया था क्योंकि तुमने धैर्य रख कर प्रेम व शान्ति को पकड़ा था। वह निनाद 3 करोड़ वर्ष से गूँज रहा था। तुमने अपनी इच्छा से माया त्यागी, ब्रह्म के निनाद को चुना।
परमात्मा की इच्छा थी 3 करोड़ वर्ष से पहले कि भविष्य में एक स्त्री उच्चतम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करे और सर्वश्रेष्ठ बने क्योंकि इस क्षेत्र में पुरुषों का राज होता है। आज तक तुम्हें संगीत सुनकर लगता है कि तुम्हें कोई अपने पास बुला रहा है – वह ब्रह्म का मधुर नाद है।
भाग – 2 तुम्हारी तपस्या अद्भुत और निराली है।
इतने कम समय में तुमने अद्वितीय संकल्पों द्वारा 1008 जन्मों की तपस्या 108 जन्मों में सम्पूर्ण की है। इसका सर्वप्रथम श्रेय तुमको जाता है क्योंकि तुमने पहल करके माया त्यागी और ईश्वर को चुन लिया सर्वप्रथम जन्म में ही। तुमने ब्रह्म निनाद जो सुना!
परमात्मा ने तुमसे 108 जीवनों में केवल पुरुषार्थ, त्याग, बलिदान और सहिष्णुता की तपस्या करवाई है। एक भी जन्म अपनी इच्छापूर्ति, सुख, आराम या तमस में नहीं बिताया है। परमात्मा का संकल्प आज जाकर पूर्ण रूप से सफल हुआ है।
तुमने ऋषि, मनुष्यों, ज्ञानियों, तपस्वियों, विलक्षण आत्माओं को ध्यान में मार्गदर्शन के लिए न केवल पुकारा, अपितु तुमने आज समाज के उद्धार के लिए, पृथ्वी की आयु को बढ़ाने के लिए, वृक्षों को, वनों के संरक्षण के लिए धरती पर उन्हें उतार लिया है।
यह पहली बार हुआ है कि परमात्मा को एक अति पुण्यात्मा द्वारा संसार में अपना संदेश भेजने के लिए एक दूत, सूत्रधार की आवश्यकता पड़ी है। वह सूत्रधार तुम सहज रूप से अपनी सर्वश्रेष्ठ तपस्या के द्वारा बन गयी हो क्योंकि तुमने माया पहले जन्म में त्यागी।
ब्रह्म का निनाद एक पल में भी इतनी अक्षय मन की शक्ति देता है कि इच्छा शक्ति, संकल्प शक्ति और क्रिया शक्ति शरीर धारण करते ही बहुत प्रबल हो जाती हैं। इनका उपयोग तपस्या करने में, परमात्मा से अत्यधिक प्रेम और श्रद्धा बढ़ाने में हो जाता है। तुम निष्पाप तपस्विनी हो!
तुम अपनी तपस्या का सारा श्रेय और फल ईश्वर को पहले ही समर्पित कर चुकी हो। उन्होंने उसे स्वीकार करके ‘विशेष कलयुग’ के लिए बचा रखा है। तुम्हारे नाभि में उन्होंने सारी दिव्य नाड़ियाँ जगाई हैं जिसके द्वारा तुम आकाश और धरती पर लोगों के विचार पढ़ लेती हो।
तुम ब्रह्माण्ड में कहीं भी ‘मन यंत्र’ से ईश्वर-इच्छा द्वारा जाकर विशेष ज्ञान, ब्रह्माण्ड के रहस्य, परमात्मा के संकल्प और इच्छाएँ, ऋषियों, तपस्वियों के अतीत और लोगों का मन पढ़ लेती हो। तुमसे ही विशिष्ट, महान कार्य प्रभु करवाना चाहते थे जिससे तुम्हें अमरता मिले।
सहर्ष जो प्रभु को माँगता है, प्रभु अपने ब्रह्माण्ड के बहुत सारे रहस्य भेंट में हमारी गोदी में करुणा के रूप में डालते हैं। जाओ, मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। निडर होकर देश-विदेश में यह बातें लोगों को सुनाओ। तुम्हारे द्वारा उनके पाप नाश होंगे, उनसे प्रायश्चित भी होगा।
भाग 3 – मेरी तपस्या और प्रायश्चित – तपस्या और प्रायश्चित धरती को बचाने का, संरक्षण करने का सर्वश्रेष्ठ है।
मेरा जन्म बहुत-बहुत पहले धरती पर हुआ था। एक बार अनजाने में मैंने 8 पेड़ आवश्यकता से अधिक काट दिए थे। मृत्यु के बाद मुझे ईश्वर कृपा से यह बात समझ आई। मैंने अपना अगला जन्म उनसे रोकने को कहा और उनसे प्रायश्चित करने की आज्ञा माँगी।
परमात्मा ने मुझे दो विकल्प दिए थे, कभी दुबारा ऐसा तुम नहीं करोगे – मैं आशीर्वाद देता हूँ। या स्वयं अपना प्रायश्चित इच्छा अनुसार माँग लो, मुझे स्वीकार होगा। मैंने उनसे प्रार्थना की कि प्रत्येक वृक्ष के काटने पर मुझे 8 जन्मों में वृक्ष बना दो।
परमात्मा रो दिए, “इतनी छोटी भूल के लिए इतनी बड़ी यातना सहोगे तुम।” ऐसा कहने के कुछ क्षण बाद कहा, “मैं तुम्हें दण्ड नहीं दे रहा हूँ , दण्ड तो तुमने स्वयं को दे ही दिया है, मैं तुम्हें एक बहुत बड़ा आशीर्वाद देता हूँ। तुम आठ बार ‘औदुंबर’ वृक्ष बनो।”
ऐसा कहकर उन्होंने मुझे साथ में आठ वरदान भी दे दिए जो मैं तुम्हें कल रात को बता चुका हूँ । औदुंबर वृक्ष में सदा एक दिव्य सदाशिव आत्मा ही जन्म लेती है, नहीं तो यह वृक्ष 8 या 9 वर्ष से पहले ही नष्ट हो जाता है। आज के समय में नाम मात्र वृक्ष बचे हैं, औदुंबर भी नाम मात्र हैं।
मैंने वे आठों वृक्ष में जन्म लेकर बहुत मौन किया, प्रकृति को उसके मूल रूप में समझा, पृथ्वी नष्ट कैसे होती है? मनुष्य के निम्न प्रकार के विचारों से, पृथ्वी को मनुष्य के संहार से कैसे बचाया जाए और पृथ्वी पर, विश्व में वन पूर्ण रूप से नष्ट हो रहे हो, तो कैसे निपटा जाए?
मेरा आखरी जन्म जो वृक्ष में आठवाँ था, वह एक टापू में था – मुम्बई। मैं 750 वर्ष पहले जीवित था, मुम्बई का सबसे बड़ा औदुंबर वृक्ष था। आज वहाँ स्वदेशी मार्केट है जो मुंबा देवी मंदिर के बहुत समीप है। मैंने तुम्हें ध्यान में दिखाया है। तुम धन्य हुई जानकर कि तुम्हारा पैर वहाँ पड़ा है।
एक मात्र ऐसे एक अन्तरध्यान अवस्था से तुम्हें मैंने दो अति विशेष सिद्धियाँ दे दीं हैं। तुम मुझसे कभी भी मन से संपर्क कर सकती हो, मैं तुम्हें पृथ्वी, वृक्ष, वायुमंडल, ब्रह्म-नाद, औषधियाँ, आयुर्वेद और निर्विकारी स्वास्थ्य कैसे मिले? सब कुछ धीरे-धीरे बताता जाऊँगा आजीवन भर।
मृत्यु से 22½ क्षण पहले मैं तुम्हारे सामने आकर खड़ा हो जाऊँगा जिससे तुम्हारे प्राणों को कोई राक्षसी आत्मा, तुम्हारी समाधि अवस्था भंग न कर दे। पिछले जन्म में यह कार्य स्वामी केशवानन्द ने ईश्वर के आदेश पर किया था। इस जन्म का सौभाग्य मेरा है क्योंकि तुमने अतीत में बहुत वृक्ष लगाएँ हैं !
भाग 4 – मेरे अनेक आशीर्वाद भविष्य में पृथ्वी की सेवा करने के लिए। तुम्हारे भविष्य के जन्म अति उज्ज्वल हैं। समाज, देश, संसार, पृथ्वी और ब्रह्माण्ड के लिए तुम अनेक आश्चर्यजनक और हैरान करने वाले अति शुभ कर्म करोगी – यह जन्म में भी तुम लोगों को आश्चर्यचकित करोगी अपने अपूर्व आध्यात्मिक शक्तियों से –
तुम्हें एक दृश्य अनेक बार मन में दिखा है जब तुम लेटी हो – एक बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष तुम्हारे पेट पर खड़ा है और उसकी जड़ें यहाँ-वहाँ तुम्हारे मध्य भाग में फैली हुईं हैं। वह बरगद नहीं औदुंबर है। तुमने ऐसा दृश्य आठवी बार 21-07-26 को शाम को 4:00 बजे देखा है।
मैंने तुम्हें सबसे पहले दर्शन 2001 नवम्बर में स्वामी समर्थ, अक्कलकोट के रूप में दिया था। मैं औदुंबर के नीचे शान्त मुद्रा में बैठा था और चारों तरफ बहुत ब्रह्म प्रकाश था। तुमने मुझे नमन करके मेरे चरण स्पर्श किए। 2018 जनवरी में मैंने तुम्हें अक्कलकोट बुलाकर वहाँ भी दर्शन दिए औदुंबर के नीचे।
तुम्हें मैंने वज्र शरीर का आशीर्वाद दिया था और कहा था कि मैं भी सदा से बहुत हृष्ट-पुष्ट था। मैं तुम्हें कल और परसों बता चुका हूँ कि यह लेख बहुत लोगों को पहुँचने वाला है। उन में सत्य जागेगा और तुम्हें उनका मन से आशीर्वाद मिलेगा। उनके अनेक पाप नाश भी होंगे।
तुम्हें अपने शरीर, मन और आत्मा को फिर से कैलाश 4 बार यात्रा पर जाने के लिए बनाना है। वहाँ से आकर जो तुम 4-8 पुस्तकें लिखोगी, वे ‘ब्रह्म के निनाद’ सुनकर ही लिखोगी। परमात्मा के कल्याणकारी बहुत से संकल्प वहाँ पर कैलाश के ऊपर आकाश में व्याप्त हैं। उन्हें तुम मन में उतारकर घर लाओ।
परमात्मा की अक्षय शक्तियाँ पृथ्वी, मानवता, सनातन धर्म, ज्योति मार्ग, मुक्ति, मोक्ष, वृक्षारोपण, पशु-पक्षियों के संरक्षण और पृथ्वी के जीर्णोद्धार की वहाँ अनंत काल से सुरक्षित हैं। तुम उन्हें धीरे-धीरे सत्य करो, नहीं तो आज का पतित मानव भारत की अति प्राचीन आध्यात्मिक शक्तियों को अज्ञान से सदा के लिए नष्ट कर देगा।
कुछ सदियों से मनुष्य अत्यधिक लालची, कामी, अहंकारी और स्वार्थी हो गया है। अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह निम्न से निम्न आसुरी शक्तियों को राजपाट, धन, महल, पुत्र, सोना चाँदी, वैभव-सुख, स्त्री-सम्मोहन और कामना से पूरा भ्रष्ट हो चुका है। ऐसे लोग विनाशकारी होते हैं।
उन्होंनें पृथ्वी को पूरा लूट लिया है, रात्रि पूजा से सम्मोहन द्वारा समाज को सुला दिया है और उनका धन, हक, स्वास्थ्य, सुख और जीवन से खिलवाड़ कर रहें हैं। मंदिरों में भ्रष्टाचार है, सच्चे संतों, विद्वानों, ज्ञानियों का तिरस्कार है और सत्य, विवेक, शान्ति, शालीनता को त्यागा है।
उनकी शक्तियों को हम अपनी तपस्या से भंग करतें हैं, उनको समाज में लज्जित करतें हैं और परमात्मा के कहने पर समाज को धीरे-धीरे बदलते हैं। तुम अपने सत्य पर अडिग हो, सत्य के लिए किसे भी ढील नहीं देती हो और सबसे दूर रहती हो। तुम सच्चे लोगों को सत्य वचन सुनाओ, उन्हें तुम्हारा बहुत आशीष मिलेगा।”
ॐ
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The Holy Audambar Tree at the temple
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22-06-26 | 11:30 AM








