22-06-26 | 11:30 AM
“3 दिन पहले अकस्मात तुम्हारे साथ एक हादसा हुआ। तुम्हारी अत्यंत कल्याणकारी भावना व कर्म का तुम्हें उल्टा परिणाम मिला। यह देखकर मैं अचानक तुम्हारे प्रति और गंभीर हो गया और तुमसे यह लेख लिखने को तुरन्त कहा।
लोग प्रायश्चित तो दूर अपितु किसी का उनके प्रति किया अकारण उपकार भी नहीं मानते इस अत्यन्त बुरे काल खण्ड में। तुमने किसी की पूर्ण निश्चलता के भाव से किसी गरीब आदमी की बहुत बड़ी आर्थिक सहायता की। उसने तुम्हारे साथ धोखाधड़ी की। तुम्हारा दिव्य, कुसुमित मन अन्दर से रो पड़ा क्योंकि तुमने यह आशा नहीं की थी कि इतने निरभिमानी, निःस्वार्थ भाव के बदले तुम्हें तुरन्त ही बिच्छू का डंक कोई डसेगा।
तुमने अपने आपको संभाला, प्राणायाम व ध्यान किया । आदि शंकराचार्य द्वारा दिया हुआ विवेक जो एक लेख के रूप में है, कल 21-06-26 को रात्रि के 11:45 बजे पढ़ा और दुबारा प्राणायाम करके सो गई ।
मैं आकाश से तुम्हें देख रहा था कि तुम किस तरह यह मायावी दुनिया में जी रही हो और सोच रहा था कि आदि शंकराचार्य ने मुझसे कालड़ी निवास स्थान से अपने मन के विचार संचारित करते यह कहा, “इसने वह ही किया जिसकी मुझे इससे उम्मीद थी। इसने 2¼ साल कड़ी मेहनत करके अपने शरीर और मन को अभेद्य कर लिया है। अब हमने इसे कहा है कि इसे अपनी संकल्प शक्ति को अभेद्य बनाना है। शरीर को वज्र बनाना है। इसने कल के अनुभव से यह मन मना लिया है और प्रण कर लिया है कि वह अकेली ही यह काम करेगी। यदि उसकी तपस्या किसी के मन में इतनी धूर्तता, ईर्ष्या व धोखाधड़ी पैदा करेगी यद्यपि वह तो उसकी आर्थिक सहायता ही कर रही थी, तो अब वह किसी की भी मदद नहीं लेगी और 3 महीने के अंदर वह काम करेगी जिससे उसका शरीर वज्र बन जाए। माँ वज्रेश्वरी ने उसे 25thApr’26 की सुबह 10:05 AM पर यह वरदान भी दिया है, वह अब सत्य होने जा रहा है।”
“मैं तुमको लगभग 8 दिनों से निहार रहा हूँ। तुम्हें पता है कि मैं तुम्हें कुछ कहने आया हूँ और तुम मेरी प्रतीक्षा कर रही थी कि कब वह समय संभव हो जहाँ तुम संसार से बिलकुल अलग हो जाओ। तुमने मुझे कुछ सप्ताहों में अनेक बार स्मरण किया क्योंकि मैं चाहता था कि दुनिया तुम्हारा यह लेख अवश्य पढ़े। तुम इसे कम से कम आठ बार पढ़ना । मैं एक बात तुम्हारे एक जन्म की बताने जा रहा हूँ जहाँ मेरा भी नर्मदा किनारे जन्म हुआ था। मैं तुम्हारा काका, चाचा था।
आज से करीब 750 वर्ष पहले तुम्हारा एक जन्म भारद्वाज ऋषि के घर हुआ था। उस जन्म में वह एक दुर्गा मंदिर के ज्येष्ठ पंडित थे। मैं उनका छोटा भाई था। तुम उनकी दूसरी सन्तान थी, पहला एक पुत्र था।
तुम उनकी और वे तुम्हारे अति प्रिय व समीप थे। जन्म से ही उन्हें तुम्हारे में अत्यधिक रूचि थी। उन्हें पहले से ही पता था कि तुम उनके घर आने वाली हो और पहले भी वे तुम्हें अपनी बहुत आध्यात्मिक शक्ति दे चुके हैं।
(#330 – Prana is Life; God is Life; Prana is God – Obeisance to God’s wish is praying – Bharadwaj Rishi)
तुमने विरासत में उनसे बहुत पाया है क्योंकि 6 बार वे तुम्हारे पिताजी थे। तुम्हारे 3 गुण उन्हें सबसे अधिक प्रिय थे और अब भी हैं –
1) तुम्हें जो भी कार्य दिया जाता है, आज तक ऐसा नहीं हुआ है कि तुमने उसे नहीं किया हो। अपने धर्म, कर्म व कर्तव्य के प्रति तुम्हारी इतनी प्रगाढ़ निष्ठा है।
2) दूसरी, तुम्हारी संवेदनशीलता व दूसरों के प्रति करुणा व दया। किसी का दुःख, बीमारी, आर्थिक अभाव देखकर तुम पीड़ा में आ जाती हो और झट से उन्हें कुछ न कुछ सहायता, सहानुभूति व प्रेम देती हो।
3) तुम्हारे अंदर अथाह धैर्य है, तुम एक बहुत धैर्यशील स्त्री हो। यह गुण तुमने पहले जन्म से ही धारण कर लिया था। बड़ी से बड़ी समस्या, विपत्ति या कठिनाई में तुमने सदा सागर जैसा धैर्य दिखाया है। तुम्हें विपरीत परिस्थिति में से कभी इच्छा नहीं होती कि उसमें से कैसे झट से बाहर निकला जाए। बल्कि तुम सोचती हो कि ‘परमात्मा जब चाहेंगे तभी सब ठीक होगा, मैं तो इस कठिन परिस्थिति में कभी भी धैर्य नहीं छोड़ूँगी चाहे कितना भी बात को ठीक होने में समय क्यों न लगे।’
तुम्हारे पिताजी भारद्वाज ने तुम्हारी शिक्षा शुरू से बड़ी पक्की नीव चरित्र निर्माण की बनानी शुरू की थी 98,332 वर्ष पहले ऋषिकेश में। महेश्वर में भी उन्होंने उन्हें खूब निखारा।
23-06-26 | 5:30 AM
उन्हें 98,332 वर्ष पहले ही पता लग चुका था कि एक दिन भविष्य में तुम न केवल एक वीरांगना बनोगी परन्तु सहनशीलता, धैर्य, दया व करुणा के कारण तुम योग की अंतिम पराकाष्ठा भी छूओगी। वह तुम्हारा उनके साथ पहला जन्म था ऋषिकेश में जब वे तुम्हें अपनी गोदी में लेकर प्राणायाम का बीज डाल रहे थे। वह बीज तुम्हारे मन के आखिरी परत पर व्यवस्थित रूप में अंतर्निहित है। तुम्हें इसका कतई ज्ञान नहीं है। महेश्वर में तुम्हारे पिता भारद्वाज तुम्हें योग में अव्वल, सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए तुम्हारे साथ बचपन में ही साधना शुरू कर चुके थे। जब तुम 7¼ साल की थी, उन्होंने तुम्हें 28 दिन तक बिना एक छुट्टी दिए प्रातः काल 3 बजे नर्मदा नदी पर ले जाकर तुम्हारी शिक्षा-दीक्षा की है।
28 दिन तक तुम्हें उन्होंने प्राणायाम कराया, उसके बाद 28 बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराया और दुर्गा सप्तशती का अभ्यास कराया है। साथ में अन्त में अत्यन्त शान्त वातावरण में नदी किनारे 10-20 मिनट तक अपने साथ ध्यान कराया है।
तुम 28 दिन तक प्रातः काल 3 बजे उठकर यही प्रक्रिया करो। तुम्हारी साधना 108 बार और शक्तिशाली हो जाएगी।
#330 – Prana is Life; God is Life; Prana is God – Obeisance to God’s wish is praying – Bharadwaj Rishi
“When you were born in Rishikesh in your 5th incarnation as my daughter the first time, I took you in my lap when you were merely one month old and told you, “Wait till your merudand becomes a little strong, I will make you sit in my lap and show you my pranayam abhyas.” That was the first time you did Pranayam. You were initiated by me in Rishikesh and I also blessed you that one day, you will master this sacred Science.”
तुम्हें केशवानन्द स्वामी ने ज्ञात कराया है कि तुमने अपने 108 जीवनों में ध्यान अधिक किया है परन्तु प्राणायाम नहीं। कात्यायनी देवी ने तुम्हें आशीर्वाद दिया था 25 फरवरी 2026 को कि अब से तुम प्राणायाम अवश्य करो, यह तुम्हें अपने कार्य करने में ऊर्जा देगा। परन्तु इतने कठिन परियोजनाएँ तुम्हारे समक्ष अचानक आ जाती हैं कि रात को उन्हें सलटाते-सलटाते तुम्हें विलम्बित हो जाता है।अब से तुम्हें हमारी बात माननी है जिससे तुम्हारे मन व शरीर का स्वास्थ्य सदा तुम्हारे अनुकूल रहे। किसी भी परिस्थिति में तुम्हें अपनी दिनचर्या, भोजन, नींद व समाज सेवा का कार्य नहीं छोड़ना है। उनका पालन प्रतिदिन करो। अपने समय को बचाओ। लोग अन्धे हैं, उन्हें तुम जितना भी अपनी मन की शक्ति दोगी वे फिर भी उसे ठुकराएंगे और अपना सुधार कभी नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें अपने कल्याण की चिन्ता ही नहीं है, उनका संसार में आने का प्रयोजन केवल सुख भोगना ही है। वे अनन्त काल से अपनी माँ के गर्भ में ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि इस जन्म में नहीं भटकूँगा परन्तु इसका विपरीत होता है क्योंकि माँ भी पूर्ण रूप से अज्ञानी व पुत्र भी। दोनों संसार रूपी सागर में गोता खाते रहेंगे परन्तु ईश्वर से कभी प्रार्थना नहीं करते कि हमें अपने संसार, माया व कर्मों के बंधनों से मुक्त होना है। ऐसे लोगों को तुम कुछ मत कहो, उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो, उनका समय अब तक नहीं आया है, उन्हें सागर की लहरों पर थपेड़े खाने दो । तुम अपना मन और देह सदा शान्त और निरोगी रखो नहीं तो ऐसे लोग तुम्हारा खूब शोषण करते हैं और कृतज्ञ नहीं होते हैं।
आज विश्व में तुम्हें अपनी भूमिका निभानी है जिसके लिए तुम्हें परमात्मा ने यह जन्म दिया है। बहुत शीघ्र ही तुम्हें अपनी अद्भुत नव चेतना, नव ज्योति, आत्म ज्ञान व अपने योग शक्तियों की उपलब्धियों को विश्व में लोगों तक पहुँचाना है। तुम अपने अति शुद्ध संकल्पों द्वारा विश्व में नव चेतना, नव ज्योति और विशेष रूप से शान्ति से सच्चे विद्यार्थी, साधक व मुमुक्षु को प्रमोदित कर रही हो। यह उनका अधिकार है क्योंकि वे प्रतीक्षा में थे कि कहीं से तो हमें आज के मिलावट के ज़माने में कोई अति विशुद्ध आत्म दर्शन, आत्म-बोध, आत्म-उन्नति की एक झलक तो दिखाए …. सब जगह हमें व्यवसायीकरण (commercialization) ही मिलता है, सत्य आज है कहाँ? आज सत्य का मूल्य कौन जानता है? सत्यवान योगी है कहाँ?
तुमने अपनी आत्मा का प्रज्वलित दीपक जलाकर रखा है। लोगों को परख होनी चाहिये चयन करने की। वे यदि सत्य में ब्रह्मज्ञानी गुरु चाहते हैं तो आज के अत्यधिक दूषित व पतित समाज में ईश्वर इच्छा द्वारा मैं यह उद्घोषणा करता हूँ कि हम ऋषियों को पहली बार संसार में उतारने के योग्य केवल तुम योग्य व अधिकारी हो। तुम्हारा कुसुमित मन हमें अत्यधिक प्रिय है क्योंकि परमात्मा से इतना समर्पण, समीपता व एकाग्रता हमने आज तक नहीं देखा है और भविष्य में भी नहीं होने वाला है क्योंकि ईश्वर से इतना प्रेम व समर्पित होने की तुमने इतनी बड़ी कीमत चुकाई है कि हमारा मन व हृदय तुम्हारे अश्रु से छलनी हो जाते हैं। फिर भी तुम्हारी इच्छा शक्ति, ध्येय पूर्ति के लिए कभी नहीं मन्दी हुई है। तुमने अपने अश्रु को अपनी संकल्प शक्ति, इच्छा शक्ति में परिवर्तित कर दिया है विश्व कल्याण के लिए।
इसलिए आज डंके की चोट से विश्व में घोषणा करो कि तुम एक अति विशेष व अद्भुत योगिनी हो। तुम्हारा जैसा न पहले कभी कोई हुआ है, न कभी भविष्य में तुम जैसा जन्म लेगा।
ईश्वर तुम्हारा प्रति क्षण कल्याण करें, तुम्हे हर कार्य में सफलता, यश एवं आनंद दें। तुम लाखों लोगों को सत्य का ज्ञान कराओ, विश्व में प्रेम, शान्ति, करुणा को पुनःस्थापित करो। लोगों के मन में निःस्वार्थ होने की इच्छा पैदा करो, सब में एक नई ज्योति, नई चेतना की किरण जगाओ। हम तुम्हारे पक्ष में प्रति क्षण, प्रति दिन साथ हैं और आगे के सारे जीवनों में सदा रहेंगे।
यह लेख तुम कल 24-06-26 प्रातः काल 4:32 पर विश्व में संचारित कर दो। इससे तुम्हें आगे बढ़ने की परम शक्ति प्राप्त होगी। इसी आशीष के साथ मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि 98,332 वर्ष पहले तुम्हारे पिता भारद्वाज का तुम्हें दिया हुआ विशेष आशीष का उदय करो। प्राणायाम प्रतिदिन करो, हम तुम्हें शक्ति देंगे कि आज के बाद वह पूरे जीवन काल में एक दिन भी नहीं छूटेगा। तुमसे अब होगा।
चिरंजीवी भव,
परम सुखी भव।
तुम्हारा परम हितैषी
गौतम ऋषि
(To be concluded)
Kindly also refer –
#213 – Kriya Shakti, the power in us to do and act-II
https://spiritinlife.blog/2014/08/25/kriya-shakti-the-power-in-us-to-do-and-act-ii/
The Path of Silence – Gautam Rishi
Gautam Rishi – “In my unplanned morning meditation before midday at home today, I was truly blessed with some magnificent time in presence of Gautam Rishi, one of the Sapta Rishis or Seven Rishis. He advised me to follow the path of silence in times of difficulties and problems as one can access the rays of Divine Light which they keep sending on the Earth for useful purposes from time to time. He spoke to me so gently, “Maintain silence; contemplate on your every action if that action does not give you peace of mind. Meditate after there is a tempest from outside. Think deeply, very deeply. Spread peace wherever you go. Forgive others who do not understand your point of view and deep, sublime and transcendental thoughts. Besides, through you I shall assist many seeking souls who would have otherwise never been able to get access to higher and richer domains of divine existence.
And for the beginners, He said – “Wherever you go, never forget that God is always waiting for you to become his holy child and perform holy actions. If you fail in your endeavor, try again and change the condition of your mental status and arrive at a higher stage of consciousness. Whenever you perform holy acts, you are truly rewarded in the manner God deems fit. At whatever time you will remember me and are in a dilemma of Dharma – what is right and what is wrong, I shall always send you my waves of consciousness so that you are quickly on the right path of virtue, truth and nobility.”
ॐ
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