
30-07-26 || गुरुवार
भाग – 1
किसी भी युग या काल खण्ड में आज तक धरती पर इतने कम वृक्ष नहीं थे। यह पहली और आखिरी बार है। परमात्मा इतनी निम्न धरती और निम्न लोगों को दोबारा जन्म धरती पर नहीं देंगे। धरती पर अनंत वृक्ष लगने चाहिए –
30 लाख वर्ष पहले धरती की जनसंख्या 1/10 थी। ज्यों-ज्यों मनुष्य समझदार बनता गया है अपनी बुद्धि का उपयोग करते-करते, उसने अपना जीवन आरामदेह बनाया। उसके पास धरती, आकाश, जल व शुद्ध हवा की कोई कमी नहीं थी। उसका स्वास्थ्य सदा से अच्छा रहा।
उसके पास ज़मीन की भी कमी नहीं थी पशुपालन, जल सिंचाई और परिवार के लिए अनाज, शाक-सब्जी और फल उगाने के लिए। यदि वह अपनी आवश्यकता के लिए एक पेड़ काटता था तो उसके स्थान पर कम से कम चार या पॉँच अवश्य रोपता था।
वृक्षारोपण सबके जीवन का अभिन्न अंग था क्योंकि आवश्यकता के लिए एक वृक्ष के जीवन का अन्त किया जाता तो प्रायश्चित के रूप में चार-पाँच वृक्ष लगाए जाते थे। मनुष्य ने अपने संस्कार इतने उत्तम रखे थे और एक उज्जवल जीवन जी रहा था।
दुर्भाग्यवश 35 से 38 हज़ार वर्ष पूर्व, मनुष्य में लोभ ने जन्म ले लिया। उसने धरती, वृक्ष, पशु-पक्षी, नदियाँ, पर्वत और वातावरण से अपना सम्बन्ध तोड़ना शुरू कर दिया क्योंकि उसके मन ने धरती को अपनी सम्पदा मानना शुरू कर दिया अज्ञानपूर्वक।
वह धीरे-धीरे वनों को काटता गया जिससे वह सपाट धरती को अपने अधिकार में ले सके और अपने स्वाभिमान से स्वयं को बड़ा समझे। ऐसा होने पर उसे समाज में उच्च स्थान मिल सकता था और वह पूजनीय बन जाता।
भूमि से अत्यधिक लगाव मनुष्य के लिए, धरती के लिए घातक सिद्ध हुआ है। ज्यों-ज्यों वह अनाज अधिक उगा रहा था, धरती की जनसंख्या बेलगाम बढ़ रही थी और प्रकृति पर बोझ बढ़ रहा था। आज परिस्थिति अत्यधिक चिन्ताजनक है।
बेलगाम संसार की जनसंख्या व धन और सुख पाने की इच्छाओं ने धरती का हाल बुरा किया है। शोषण भी सब तरफ बहुत है। अंधाधुन वनों को, वृक्षों को लोगों के लिए काटा जा रहा है। सड़के निरंतर बनाई जा रहीं हैं, आवश्यकता से अधिक घर निर्माण हो रहें हैं।
आज से 500 वर्ष से अधिक यह धरती हम सबको जीवन नहीं दे पाएगी यदि हम धीरे-धीरे अपने संस्कार, मन के भाव और शालीन जीवन न अपनाएँ। परमात्मा अपनी सृष्टि का नाश नहीं होने देंगे। फिर से संतुलन लाने के लिए वे निम्न लोगों को पुनः धरती पर नहीं आने देंगे।
भाग – 2
तुम्हारा आज के युग में कार्य है संसार को सत्य बताना। तुम्हारे सत्य के हक़दार और उत्तरदायी कोई बिड़ला ही होगा। परन्तु आज से 526 वर्ष पश्चात, जो सत्य तुम धरती पर उतार लाई हो, लोगों को इसका मूल्य तब समझ आएगा –
तुम्हारा कठोर परिश्रम, अथक पुरुषार्थ और निर्विकारी जीवन तुम्हें अपने ध्येय में सर्वश्रेष्ठ, परम स्थान विश्व में देने वाला है। तुम धैर्य मत छोड़ना। बहुत लम्बे अन्तराल के बाद तुम्हें क्षितिज के परे दिखाई दिया है। तुम्हें अपना उज्ज्वल भविष्य अब दिखाई दे रहा है।
तुमने केवल और केवल तपस्या की, ईश्वर की इच्छा पर सारा जीवन व्यतीत किया है। तुम्हें पता ही नहीं था कि तुम क्या साधना कर रही हो, इससे क्या लाभ मिलने वाला है और ये साधना और मार्ग कौन सा है? तुम्हें तो केवल परमात्मा के दर्शन करने थे, चाहे कुछ भी हो जाए।
अब 26 वर्ष बाद तुम्हें पूर्ण सत्य प्राप्त हुआ है और ऋषियों, तपस्वियों और महान से महान आत्माओं ने तुम्हें साक्षात दर्शन दिए हैं जिससे तुम निश्चिन्त हो कि तुम्हें प्राचीनतम ऋषियों का पथ और साधना दी गई है जिससे तुम्हारी तपस्या 108 जन्मों की सफल हो जाए।
कोई कभी नहीं जान पाएगा कि इस आध्यात्मिक उन्नति और सफलता की तुमने कौन सी कीमत चुकाई है, यह बात केवल परमात्मा और हम जानते हैं। तुम सदा शान्त, प्रसन्न, विनम्र और गम्भीर रहती हो। तुम्हारे मन की बात, आत्म-अवस्था और प्रज्ञा कोई नहीं जान पाएगा।
केवल जब तुम सत्य का प्रवचन करोगी, अपनी लेखनी चलाओगी या अपना दृष्टिकोण और विचार प्रकट करोगी, तब तुम पहचानी जाओगी। नहीं तो तुम एक साधारण, घरेलू स्त्री दिखाई दोगी और कभी किसी को नहीं बताओगी कि तुम वास्तव में कौन हो – तुम अति दुर्लभ आत्मा हो।
आज संसार तुम्हारी कदर नहीं करेगा क्योंकि किसी के पास वे ज्ञान-चक्षु कहाँ? कोई वे पारखी हीरे आज कहाँ जो कोसों दूर से अपने पवित्र मन में जान जाएँ कि उनके आस-पास कहीं कोई विशेष आत्मा रहती है जिसका सम्पर्क सीधा हमसे और परमात्मा से है – उनका सौभाग्य है कहाँ?
सब कुछ समझते, जानते हुए भी तुम अपने आनन्द में हो, निष्काम भाव से सबकी सेवा करती हो और सब से दूर रहना चाहती हो। तुम्हें ईश्वर-साक्षात्कार के बाद सब कुछ बेस्वाद और फीका लगता है। पूरी माया से मन अलग रहता है और हर क्षण प्रतीक्षा में मन होता है कि अगला संदेश क्या होगा?
न तुम्हें कोई इच्छा है कि दुनिया तुम्हें जाने, माने या कभी पहचाने। तुम अज्ञात रहना चाहती हो क्योंकि तुम्हें ईश्वर प्रेम, गुरु सान्निध्य सर्वोत्तम प्रिय है। मन में एक इच्छा नहीं है। ईश्वर को तुमने कितने रूपों में जाना है, अनुभव किया है कोई नहीं जान सकेगा। तुम्हें किसी को कुछ नहीं कहना या समझाना है।
भाग – 3
आज का युग मिथ्याभाषी, मिथ्यावादी, ढोंगी, असत्यभाषी और बहुत लालची लोगों का है। तुम जैसी अति पावन आत्मा को हमारी और परमात्मा की पूर्ण सुरक्षा और निगरानी है। उनका वश चले तो वे अपने सम्मोहन, षड्यन्त्र और मायावी स्वभाव से तुम्हारी तपस्या अपने स्वार्थ और धन प्राप्ति के लिए कर लेते। तुम अबाध्य हो –
किसी के मन में भी यदि संकल्प उठेगा कि वह तुम्हारी तपस्या चुराकर अपनी आध्यात्मिक शक्ति, मन की शक्ति या धन सम्पत्ति में वृद्धि कर लेगा तो वह विफल हो जाएगा। यह मेरा आशीर्वाद तुमको है। तुमने अपनी सारी तपस्या ईश्वर के चरणों में समर्पित की है, तुम सुरक्षित हो।
आज के युग और समय में अधिकतम साधु तपस्या किए बिना सर्वश्रेष्ठ माने जाने की इच्छा को मन में रखते हैं। उन्हें धन, नाम, यश और ख्याति सर्वप्रिय है। मन की मौन, सर्व संकल्पों का विलीन होना, आत्म उन्नति और अमृत-मंथन नहीं करते। सदा चर्चा में रहना चाहते हैं।
इतनी क्षणिक वस्तुओं के पीछे यदि सब भागेंगे तो दीर्घ काल तक आत्मा का साक्षात्कार असंभव है। नवीन कर्म, शुभ संकल्प प्रभु-इच्छा से मन में नहीं जन्मेंगे अपितु माया के मन में स्पंदन द्वारा होंगे। ऐसा जब होता है तो संसार में अज्ञान बहुत फैलता है, सबके मन में इच्छाएँ पैदा होतीं हैं।
ऐसी तरंगे दीर्घ काल तक वायुमण्डल में स्पन्दन करतीं रहतीं हैं और समाज को दूषित करतीं हैं। एक सांसारिक इच्छा अनेक इच्छाओं को भविष्य में जन्म देतीं है। अहम्-भाव को पुष्ट करतीं हैं और धीरे-धीरे शेष लोग भी ऐसा आचरण देखा-देखी में करते हैं। समाज को सावधान होना चाहिए।
आज के समाज में, युग में, सच्चा संत, साधु, योगी, गुरु, समाज सेवक और शिष्य मिलना अत्यन्त दुर्लभ है क्योंकि किसी ने सत्य के लिए तप नहीं किया है। तपस्या और प्रायश्चित के बिना ईश्वर-प्राप्ति नहीं हो सकती। महामानव बनने के लिए कई जन्मों तक ईश्वर भक्ति और गुरु भक्ति करनी होती है।
यही परिस्थिति देखते हुए परमात्मा ने मुझे आज्ञा दी कि संसार को बहुत गहरी नींद से जगाओ। आज संसार पुराने उच्च संस्कार, तप बल, योग बल, पुरुषार्थ शक्ति, स्मृति, आध्यात्मिक शक्ति और शालीनता से शून्य है। अपने ही अज्ञान-सर्प से सब ग्रस्त हैं, स्वयं को विषय दंश से मूर्छित कर रहे हैं।
ऐसी परिस्थिति में तुम सच्चे लोगों के लिए आशा की आकाश व धरती पर एक उज्जवल किरण हो। सबको आस दे सकती हो कि परमात्मा का अस्तित्व है, ऋषियों ने लाखों वर्ष पहले आकर धरती पर कठोर तप किया है जिससे धरती प्रलय के बाद नष्ट कभी न हो।
तुम नि:संकोच विश्व में सत्य का झंडा फहराओ, डंके की चोट से कहो कि जो तुम आकाश के, धरती के दिव्य स्थानों से, अपने तप से सत्य, ज्ञान, योग और ऋषि मुनियों के अतीत और जीवन जान रही हो, संसार को बता रही हो वह 100% सत्य है।
भाग – 4
तुम्हारे मन की पुकार सुन कर मैं आया हूँ। तुम्हें तपस्वी, योगी, ऋषि-मुनि अत्यधिक प्रिय हैं क्योंकि वे ईश्वर की खोज में अनेक जन्म तपस्या करते हैं। तुम मुझे जानना चाहती हो और मेरी विशेषताएँ और उपलब्धियाँ जानने की अभिलाषी हो। मैं तुम्हें आशीर्वाद के रूप में बताऊँगा। तुम चिरंजीवी हो!
मैंने 128 जन्मों में मौन की है उनमें से आठ जन्म औदुंबर वृक्ष में तप किया है। मैंने किसी भी जीवन में एक भी पाप नहीं किया, केवल पृथ्वी को पूरी तरह नष्ट कभी नहीं होने के लिए तपस्या की है। मैंने भगवान से वरदान मांगा कि मैं हर जन्म में पृथ्वी की सेवा-पूजा करूँ, यही मेरा तप होगा।
वृक्षों के अभाव से धरती पर क्या-क्या आपदाएँ आती हैं? मनुष्य के मन पर वृक्षों के घटने से क्या कुप्रभाव होता है? धरती पर वन्य जीवन घटता या बढ़ता है तो मनुष्य के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है? कौन-कौन से वृक्ष सबसे अधिक प्राण धरती पर छोड़ते हैं?
वृक्षों की आयु किस प्रकार घटती या बढ़ती है धरती पर लोगों के मन के विचारों के प्रभाव से? ब्रह्माण्ड में ऐसे कौन से विषय हैं जो वन-जंगलों को शक्तिहीन या शक्तिशाली बनाते हैं? भविष्य में धरती पर क्या होगा या क्या होना चाहिए जिससे फिर से अक्षय वृक्ष हों?
वृक्षों को हम अपने शुभ संकल्पों से लंबी आयु दे सकते हैं? वे वायुमण्डल में ऑक्सीजन कैसे अधिक दें? यदि पीपल, बरगद के नीचे बैठकर ध्यान करना हो तो मन में कौन से विचार नहीं होने चाहिए? वृक्षों का आशीर्वाद कैसे प्राप्त किया जाए?
उनसे मनुष्य दूर-ध्वनि से कैसे बात कर सकता है? मन में मनुष्य वृक्षों की बातें कैसे सुन सकता है? उनमें कौन सी आत्मा अंदर वास कर रही है? वृक्ष मनुष्यों को किन-किन परिस्थितियों में श्राप देते हैं? वह श्राप किस प्रकार माफ़ किया जा सकता है?
तुमने आज तक 108 जीवनों में से 84 जन्मों में बहुत सारे वृक्ष लगाएँ, सबसे अधिक बरगद और पीपल के रोपे हैं। तुम उनसे बहुत आत्मीयता रखती हो और पृथ्वी पर बहुत-बहुत वृक्ष लगाने की इच्छा मन में समेटे हो। भविष्य में यह सत्य होकर रहेगा चाहे 3 लाख वर्ष बाद क्यों न हो।
संसार को यह जानना चाहिए कि मैंने तुम्हें मेरा अति दुर्लभ समय क्यों दिया? क्योंकि तुम एक विशेष स्त्री धरती पर हो। तुम्हारा सबसे पहला संकल्प अति शुभ था जिससे परमात्मा अत्यधिक प्रसन्न हुए और ईश्वर ने उसी क्षण तुम्हारे भविष्य की तपस्या निर्धारित कर दी।
108 जन्मों की तुम्हारी तपस्या का फल आज संसार देख रहा है और ढेर सारा लाभ ले रहा है। क्योंकि ईश्वर ने तुम्हें चुना हमारे बारे में विश्व में पहली बार बताने के लिए, मैं मान गया । नहीं तो मैंने सदा के लिए मौन धारण की शपथ ले रखी थी। मैंने तुम्हें आज आशीर्वाद दिया है, तुम हर कार्य में केवल सफलता पाओगी!”
ॐ
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22-06-26 | 11:30 AM






