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मन तुम्हारा आश्रम है, आत्मा और जीव का संगम है – माँ कात्यायनी, वृन्दावन (4 of 4)


Delhi-Vrindavan Yatra 24th to 28th Feb’26-


मन तुम्हारा आश्रम है, आत्मा और जीव का संगम है – माँ कात्यायनी, वृन्दावन 250226 

भाग 1 | माँ मुझसे 25 फरवरी की शाम को –

“अभिव्यक्ति तुम्हारी इतनी कोमल व प्रेम से भरी। मन इतना गहरा और शान्तिप्रद मैंने तुम्हारा देखा जब तुम मेरे द्वार पर मुझे देखने खड़ी हुई थी उस दिन। 

एक युग जैसे बीता हो और आखिरकार ऐसा जीव मेरे द्वार पर कोई आया हो जिसकी मैं अनन्त काल से प्रतीक्षा कर रही थी। तुम्हें देखकर मैं तो स्तब्ध ही रह गई थी। 

इस घोर कलियुग में ऐसी आत्मा क्या कभी जन्म ले लेगी? उत्तर है – नहीं। कभी नहीं क्योंकि एक छोटे मोगरे के फूल जैसा तुम्हारा मन कैसे इतनी अशान्ति सह सकेगा?

यद्यपि यह होता नहीं है परन्तु तुमने ईश्वर से अपनी बात मनवा ली और तुमने यह जन्म तेईस बार ठुकराने पर भी ईश्वर से मनवाकर माँग ही लिया। आज तुम उस शपथ पर पूर्ण रूप से खरी उतर गई हो। 

पिछले जन्म में मृत्यु के बाद तुमने परमात्मा से कहा था, “मुझे एक मौका तो दीजिए। यद्यपि यह अवसर मिला भी नहीं है, तो भी मैं पहले से ही आपको आश्वस्त करती हूँ – मैं अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु त्याग चुकी हूँ। मेरे पति मुझसे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। 

मैं अपने पवित्र प्रेम का बलिदान करती हूँ हे प्रभो! मुझे केवल आप चाहिए और कुछ भी नहीं। मुझे अगला जन्म कैसा भी मिले, किसी के साथ भी आना हो, आप दुःखी न हों, मुझे सब स्वीकार है। 

मेरे मन में केवल आप ही रहा करें, मैंने अपना मन सारा का सारा खाली कर दिया है। यह मन आपका घर है, यह आज से आश्रम बना। इसका नाम आप क्यों न ‘आनन्द आश्रम’ रख देते?”

“ईश्वर ने तुम्हारी याचना आखिर में मान ही ली और तुमने एक जीवन ऐसा पा लिया जिसमें ईश्वर ने एक ऐसी परियोजना बना ली जिससे तुम अत्यधिक कठिन, नवीन व कठोर कार्य करो।

 

भाग – 2 | कल और आज

तुम्हारा यह जीवन अत्यन्त कठोर रहा है परन्तु कल का जीवन था अत्यधिक आरामदेह व सुखजनक। प्रेम, शान्ति व पारिवारिक सुख से भरा जीवन तुम्हें यह भी मिलने वाला था परन्तु ईश्वर ने तुम्हें कठिनाइयों से घेरे रखा। 

इस जन्म में तुमने एक बार भी ईश्वर से रुष्ट होकर नहीं कहा कि वे इतना भार तुम्हारे कंधों पर क्यों रखते हैं? तुमने हर काम किया और नए कीर्तिमान स्थापित करती गई क्योंकि तुम्हें तो केवल ईश्वर का प्रेम पाना था और इस में भी तुम्हें भरपूर सफलता मिली है। 

ईश्वर ने तुम्हें अत्यधिक ब्रह्म प्रकाश से भर दिया है। तुम्हारे ध्यान में प्रतिदिन आते हैं और तुम्हें हर बात का जवाब देते हैं क्योंकि तुमने अपने सर्वाधिक प्रिय जन का भी त्याग कर दिया। तुमने उसके बदले में ईश्वर का प्रिय कार्य किया है। 

तुमने अपने तप-बल व योग-बल से अज्ञात ऋषियों को अब संसार में उजागर किया है जब धरती पर बहुत असमंजस व कोलाहल है। धरती पर असामाजिक तत्त्व व असत्य का बहुत बोलबाला है और सच्चे साधु-सन्तों का कोई नहीं रखवाला है। 

प्रभु ने तुम्हें अत्यधिक सुरक्षित रखा है और तुम्हारे तप को एक विशेष कार्य के लिए संजोए रखा है। तुम्हें ऋषि मुनियों के तप को फिर से संसार को बताना है। तुम्हारे व उनके तप से मनुष्यों के मन का विकार नष्ट होगा। 

यह कार्य के लिए ईश्वर को एक स्त्री की ही आवश्यकता थी क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि आध्यात्मिक क्षेत्र में पुरुषों का ही राज हो। नारी शक्ति भी संसार के लोगों की चेतना को जगा सकती है यदि उसे भी उतना साहस, इच्छा व अवसर दिया जाए।

तुम्हें तुम्हारे त्याग के बदले में ईश्वर ने बहुत सारे ऐसे कार्य दिए हैं जो न केवल तुम्हें बहुत प्रसन्नता दें, अपितु संसार का भी उद्धार हो जाए। तुम्हें मैंने अपने विशेष स्थान पर मेरा दर्शन दिया व आशीर्वाद देने के लिए बुलाया है। एक नहीं, दो बार तुम्हें याद किया है। 

मैंने तुम्हें सिंह के जैसा अदम्य साहस आशीर्वाद के रूप में 250226 को दिया है। तुम जहाँ भी जाओ साहसी कार्य करो और समाज को सत्य की ओर ले जाओ। ब्रह्माण्ड की कोई भी शक्ति तुम्हारे कार्य को असफल नहीं करेगी। 

 

भाग – 3 | जीवन में तपस्वियों, ऋषियों का आगमन पुण्यों का फल 

तुमने हर जीवन में अथक पुरुषार्थ किया है, ईश्वर का दर्शन मिले केवल यह ही माँगा है। तुम्हारी हर वेदना से प्रभु ज्ञात हैं। तुमने कभी भी, किसी भी जन्म में नहीं किसी का किया अहित है। दान-पुण्य, प्रार्थना व दया और करुणा से हर जीवन व्यतीत किया है।

28 करोड़ पुण्य तुम ईश्वर को दे चुकी हो जिससे लोगों का जागरण हो, 33 करोड़ पुण्य दान रूप में दे चुकी हो जिससे भारत विधर्मियों से छुटकारा पा ले और 75 करोड़ पुण्य दे दिए हैं जिससे तुम्हारी धरती माता कभी भी नष्ट न हों। 

ईश्वर ने जब भी तुमसे तुम्हारे पुण्य दान में, भिक्षा में माँगें हैं जब तुम्हें उनके दर्शन गहरी समाधि में प्रातः काल में होते हैं, चाहे तुम जागी हो या नींद में, वे दोनों तुम्हारी समाधि अवस्था है। तुमने कभी भी ‘ना’ शब्द का नहीं किया प्रयोग है।”

तुम परमात्मा से – 

“सब आपका है, मेरा कुछ न पहले था, अब भी कुछ नहीं मेरा है। आपका सब दिया है, क्या आवश्यकता है आपको मुझे यह बताने की कि मेरे पुण्य आपको प्राप्त हों? मेरी हर वस्तु पर सारा अधिकार आपका ही है।”

माँ कात्यायनी – 

“प्रयागराज में प्रातः काल 4:12 पर परमात्मा ने तुम्हें 191025 को दर्शन दिए थे और मधुर स्वर में आशीष देते हुए कहा था, “ब्रह्म शाश्वत है, ॐ शाश्वत है, पृथ्वी शाश्वत है, सत्य शाश्वत है।” यह सुनकर तुम्हारे सारे जन्म धन्य हुए हैं। 

तुम्हारे आगे आने वाले सारे जन्म ब्रह्म, ॐ, पृथ्वी व सत्य की तपस्या के लिए परमात्मा ने निश्चित कर लिए हैं। तुम्हें ये अत्यधिक प्रिय हैं; तुम्हारी आत्मा संतुष्ट हो जाती है सत्य, ब्रह्म, ॐ व पृथ्वी की पूजा करके। 

ऋषि-मुनियों के जीवन, चरित्र, कर्म, कथाएँ एवं आचरण तुम्हें सर्व प्रिय हैं क्योंकि तुम्हें उन में भी ब्रह्म, ॐ, पृथ्वी व सत्य का दर्शन मिलता रहता है। तुम उनके जीवन, कर्मों, विचार व आचरण से अत्यधिक प्रभावित हो। 

तुम मेरे परम भक्त केशवानन्द की तपस्या जानना चाहती हो जिससे तुम्हें और शक्ति मिले अपने सुकर्म की वृद्धि करने में। तुम चाहती हो कि तुम्हें कोई तो बताए यह शक्तिपीठ श्री कात्यायनी की स्थापना किसने और कैसे व कब की थी। यह बताने के लिए मैंने तुम्हें 260226 को बुलाया है।

 

भाग – 4 | अथक पुरुषार्थ, तपस्या व देशभक्ति से ओत-प्रोत यह श्री कात्यायनी शक्तिपीठ की भूमि व आकाश है 

 

बहुत-बहुत पहले केशवानन्द तपस्या करने वृन्दावन में जन्मे थे परमात्मा के कहने पर। एक बालक को, श्वास का सारा विज्ञान, श्वास की धारा नाड़ियों में व जन्म-मरण की गति का विशेष ज्ञान की भेंट उनको सहज रूप में देना था। ऐसा ही हुआ। 

यदि श्वास को उसकी नियमित गति द्वारा संग्रहित करके एक लय में बांधा जाता है कम से कम साढ़े बारह वर्ष तक तो नाभि में अद्भुत शक्तियों की ग्रंथियाँ जाग जाती हैं। ऐसा होने पर ईश्वर ऐसे प्राणियों से जन लोक में उनसे चमत्कारी कार्य करवा लेते हैं। इसलिए उनकी आयु लम्बी हो जाती है और वे अमर हो जाते हैं। 

प्राचीन काल में परमात्मा ने इस उद्देश्य से केशवानन्द को अपने ध्यान व प्राण को भृकुटि में केंद्रित करने वृन्दावन के बहुत घने जंगलों में भेजा। तपस्या की रक्षा करने के लिए माँ काली की उपासना करने को दी जिससे भूत-पिशाच, डाकिनी-शाकिनी उन्हें त्रास न दें। काली माँ ने राक्षसों को, भूतों को, उनके रास्ते से हटा दिया। 

प्राण वायु-मण्डल में ओत प्रोत हैं। पूरे ब्रह्माण्ड में कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ पर मनुष्य के विचारों की गति नहीं पहुँच सकती। माँ काली ऐसे विकृत, कुकर्म करने वालों के मन को विग्रहित कर देतीं हैं जिससे उनका विस्फोटक मन छिन्न-भिन्न हो जाता है। 

प्राण मन की गति को शक्ति देता है। मन में ईश्वर का वास होता है। यदि प्राण को इच्छा व वासना से दोषी व पापी बना दिया जाए तो ऐसी दुरात्मा विश्व में बहुत अशान्ति, आक्रमण व उपद्रव करती हैं। माँ काली ने केशवानन्द को अत्यधिक प्राण व मन की शक्ति दी जिससे वे अपनी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाएँ। 

ऐसे महान योगी को अपनी मातृभूमि से पहले ही जन्म में सर्वाधिक प्रेम हो गया। उन्होंने सदा संन्यासी बनना व मातृभूमि की सेवा का संकल्प मन में धारण कर लिया था। प्रभु ने उन्हें सदा तपस्या करने में पूर्ण सहयोग दिया जिससे वे अपना तप विश्व को एक विशेष काल चक्र में दे दें। 

कात्यायनी शक्तिपीठ वह स्थान है जहाँ पर केशवानन्द के आठ जन्मों का तप भूमि व आकाश में व्याप्त है। मैं – कात्यायनी प्राणायाम की देवी हूँ। मैं विशेष रूप से भारत के लिए ईश्वर की सृजन शक्ति के रूप में प्रकट हुईं हूँ। मैं कुण्डलिनी को जगाती हूँ। मैंने भारत का झण्डा बनाया है। मैं आज, 100326 को उद्घोषणा करती हूँ। 

  • भारत एक आध्यात्मिक शक्ति है। यहाँ सबसे पहले ऋषियों, मुनियों ने एक करोड़ वर्ष पहले इसे आध्यात्मिक बनाने के लिए तप किया है। तुम हमारी सूत्रधार हो, तुम्हें अब ऋषियों को संसार में प्रकट करना है। तुम अब से मेरी पुत्री हो, तुम्हें केशवानन्द को विश्व में अमर करना है। विश्व भविष्य में तुम्हें सारिका नहीं, ऋषिका नाम से जानेगा।”

– माँ कात्यायनी 

100326 | 10:00 PM

&

130326 | 09:26 AM

स्वामी केशवानन्द – “मेरा तर्पण करने के लिए परमात्मा ने तुम्हें करोड़ पुण्य भेंट किये हैं। यह अति,अति शुभ कार्य तुमने बहुत ही मंगल घड़ी पर किया। वह था 260226 वृन्दावन सायंकाल 6:226:23 मिनट पर हुआ। ईश्वर कुछ पलों में अत्यधिक श्रेष्ठ कार्य करने की क्षमता रखते हैं। अब मैं पूर्ण रूप से मन से मुक्त हूँ। मैं तुम्हें भी पूर्ण रूप से मन से मुक्त चाहता हूँ। पिछले जन्म की तुम्हारी दर्दनाक मृत्यु जयपुर के आमेर किले में हुई है। तुम्हारा तर्पण मैंने तुम्हारी मृत्यु के 28½ मिनट में कर दिया था जिससे तुम्हारे मन में स्थाई रूप से कोई भी दुःख देने वाली स्मृति नहीं बने। मन की शक्ति घट जाती है यदि हमारे सूक्ष्म प्राण ऐसी स्मृति में खर्च होते हैं। 

उससे पहले तुम उदयपुर में राज घराने में जन्मी थीं। मैं एक पहाड़ी पर अकेला रहता था जो तुम्हारे महल के कमरे से देखी जा सकती थी। मैं पहाड़ी से बहुत कम नीचे उतरता था क्योंकि मैं अपना चेहरा सबको नहीं दिखाना चाहता था। लोगों के मन व प्राण पूरी तरह मैले होते हैं क्योंकि वे केवल संसार का चिंतन करते हैं और ईश्वर का स्मरण, नाम जाप, कीर्तन व ध्यान कदापि नहीं करते। 

एक दिन तुमने अपनी सेविका को बुलाया और कहा कि “एक खास काम आठ दिन में तुम करो। तुम रोज महल की छत पर सुबह 68, शाम को 46 बजे कभी भी चढ़कर देखो कि तुम्हें वह अज्ञात साधु  दिखाई देते हैं कि नहीं? ईश्वर करें उनका स्वास्थ्य अच्छा हो।” 

तीसरे दिन तुम्हारे पास शाम को 5:30 बजे खबर आ गई कि साधु बाबा दिखाई दे गए। तुम बहुत हर्षित हुई और अगले दिन सुबह 6:30 बजे तुम चार सेवा-धारियों सहित पहाड़ी पर चलने लगीं। साथ में था गर्मियों को दूर करने का भोजन जैसे खरबूज़े व सीताफल के बीज, नींबू, घर का बना गुलकन्द, शरबत व त्रिफला। साथ में थीं पैदल चलने के लिए, पहाड़ी पर चढ़ने उतरने के लिए 2 छड़ियाँ और ढेर सारा जल व सूखा जीरा पिसा हुआ और नमक। 

गर्मी का मौसम था इसलिए मैं कमज़ोर हो गया था। तुम्हारा मन गंभीर व शान्त था। मैंने तुम्हें बहुत याद किया था। तुमने मेरी पुकार सुन ली थी। मेरे दर्शन से तुम धन्य हुई। उसके बाद तुम अन्त तक हर मंगलवार को सायंकाल मेरे लिए बहुत सामग्री, दवा, कम्बल, वस्त्र, कमंडलु, जल व दरी, चटाई मुझे ध्यान लगाने के लिए प्रेम से लाई थी। साथ में धूप, दीप, ज्योत करने के लिए क्योंकि मैं काली माँ का भक्त था। तुम हर मंगलवार मेरा दर्शन करने आती थी। 

ईश्वर ने एक रात को मुझसे गहरी शान्ति में पूछा, “क्या यह स्त्री तुम्हारा तर्पण कर दे जिससे तुम सदा के लिए मुक्त हो जाओ? क्या तुम्हें यह स्वीकार है? परन्तु आज नहीं, 260226 को संध्याकाल को, महाकुम्भ के पूर्ण एक वर्ष बाद। उससे शुभ घड़ी 28,000 वर्ष में इस कार्य के लिए नहीं है।”

मैंने परम पिता परमेश्वर की बात को दिल से मान लिया। तुम वृन्दावन को इस महान कार्य के लिए आई थी। मुझे सब याद था इसलिए मैंने तुम्हारे लिए मेरा निवास स्थान खोल कर कार्यकर्ता, प्रबन्धक के मन में संकल्प डाल दिया और तुम अति धन्य हो गई। तुम्हें मेरी ध्वनि, आवाज़ भी सुनाई दी यद्यपि मैं शरीर में नहीं था। तुमने मेरी आवाज़ सुनी है इसलिए तुम्हें गुंजन हुआ।

कोई भी एक गरीब साधु, अज्ञात वास में हो उसका ध्यान नहीं रखता। तुमने इसका विपरीत किया। अपने घर के सदस्य समझकर, पिता समझकर मेरी सेवा की।

अब मैं मुक्त होकर तुम्हें एक बड़ा आशीर्वाद देता हूँ। तुम्हें अनन्त यश मिलेगा, तुम विश्वविख्यात बनोगी। तुमने यह जन्म केवल कठिनाइयों में जिया है। परन्तु अगले सारे जन्मों में तुम अत्यधिक विख्यात लेखिका, समाज सेविका व ऋषिका बनोगी। तुम्हें संसार एक कण मात्र भी नुकसान, दुःख नहीं देगा, तुम्हें केवल परमात्मा को आगे रखना है। मैं तुम्हें मेरी कहानी से अमर कर दूँगा। कुछ वर्षों बाद तुम एक चलचित्र (movie) ‘आनन्द आश्रम’ बनाओ। वह हमारी जीवनी होगी। समाज व संसार को पहली बार ऋषियों के और परमात्मा के संदेश जाएंगे इस मूवी से। ऐतिहासिक पिक्चर बहुत बनीं हैं परन्तु उनमें कभी संदेश नहीं था।    

तुमने न केवल निर्भीकता दिखाई है, तुमने महासागर जैसा धैर्य प्रदर्शन किया है, यह बहुत आश्चर्यजनक है। किसी को भी आज संसार में पूर्ण सत्य ज्ञात नहीं है, केवल तुम्हें है। फिर भी तुम्हारे अन्दर इच्छा नहीं है कि संसार में जानी जाऊँ। अब समय आ गया है संसार को तुम्हारी कीमत करनी चाहिये। यही परमात्मा की इच्छा है।

तुम जहाँ जाओ, सत्य का प्रकाश फैलाओ। तुम्हारे पास खज़ाने मे अनन्त पुण्य हैं। तुम्हारे परिवार, शिष्यों, समाज व संसार का कल्याण होगा; उन्हें तुम्हें तुम्हारा स्थान, जो उच्चतम है, देना ही होगा।

तुम एक पुस्तक लिखो, शीर्षक ‘आनन्द आश्रम’ होगा। 200 तक पृष्ठ रखो। वह तुम्हारी और मेरी कहानी होगी और विश्व को जगाने के लिए ब्रह्म-प्रकाश तुम्हारी वाणी, देह, बुद्धि, मन व आत्मा से फैलेगा। हम तुम्हारे साथ सदा रहते हैं और रहेंगे। तुम्हारा कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता क्योंकि पुण्य की कवच तुमने पहन रखी है जिसे कोई भी भेद नहीं सकता। संसार में आंधी-तूफान आऐंगे, तुम घबराना मत, तुम अपना कार्य करो, तुम्हें अनन्त सफलता मिलेगी। यही आशीर्वाद के साथ तुम यह लेख समाप्त करो और चैत्र नवरात्रि 2026 को षष्ठी को 24 मार्च ’26 को प्रकाशित करो। षष्ठी मांँ कात्यायनी का दिन है।


आशीष सहित
तुम्हारा पिता
केशवानन्द

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