“आज का दिन तुम्हारे लिए बहुत शुभ रहा है। कश्यप ऋषि की भाँति मुझे मौन प्रिय है, मैं तुम्हें आज आशीर्वाद देने आया हूँ।
केवल आठ छंद मैं तुम्हें अति प्रेम से लिखवाऊँगा क्योंकि तुम्हारे कार्य को आखिरकार लोग सराह रहे हैं। वह तुम्हारी और तुम्हारे शिष्यों की तपस्या है।
पहली बार एक स्त्री ने विश्व में उद्घोषणा की है, नाद घोष हुआ है पृथ्वी पर। आखिरकार अत्यधिक श्रद्धा, सम्मान व प्रेम से तुमने हमें संसार में उतारा है।
अनन्त काल से ऋषि मुनियों ने भारत माता को अपने तप, त्याग व शान्ति से उसे महान आध्यात्मिक शक्ति बनाया है। तुमने हमारा परिचय विश्व को अब दिया है।
स्त्री के लिए कठोर तपस्या करना कठिन होता है क्योंकि उसे अपनी गृहस्थी संभालनी होती है। उसका मन मातृत्व भाव के कारण कोमल होता है। तुमने गृहस्थ में संन्यास लिया है।
108 जन्मों की सारी तपस्या तुमने इस काल खण्ड के लिए पृथ्वी व लोगों को प्रलय से बचाने के लिए समर्पित की है। आज मनुष्य पतित है, उसकी आत्मा पर विषयों का विष चढ़ा हुआ है।
मन सबके अशान्त, अन्धकारमय एवं सोए पड़े हैं। आज मानवता को हिंसा, द्वेष, लोभ व स्वार्थ से कौन उभार सकता है? अदृश्य रूप में मानवता को ऋषि-मुनि शनैः शनैः जगा रहे हैं, तुम हमारी सूत्रधार हो।
हमें तुम पर अत्यन्त गर्व और पूरा विश्वास है। यदि धरती पर आज तुम जैसा एक मनुष्य है तो धरती सुरक्षित है। शेष काम हमारा है। परमात्मा ने इस काल के लिए हमें और तुम्हें संसार में आलोकित किया है।”
चिरंजीवी भव पुत्री
पिता मतंग
ॐ
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