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यह जीवन तुम्हारा अति अद्भुत रहा है, अगले सारे भी अद्भुत रहेंगे – मतंग महर्षि (1 of 2)

14-06-26 | 6:22 PM 

“तपस्वियों के घर जन्म नहीं लिया परन्तु तुमने यह जीवन केवल तपस्या हेतु स्वेच्छा से जीया है। आगे का यह जीवन भी तप में तुम जीओगी। 

तुम्हारी अति तीव्र इच्छा-शक्ति तुमसे अद्भुत कर्म कराती है। त्याग, बलिदान एवं ईश्वर इच्छा पर चलने का संस्कार तुम पर ईश्वर की कृपा बरसाता है। 

आज से, अब से तुम्हारा प्रत्येक क्षण और श्वास अति महत्वपूर्ण है, तुम्हें भविष्य में ऐसे-ऐसे काम समाज के उद्धार के लिए करने हैं जिसका तुम्हें भान नहीं है। 

पृथ्वी पर ऋषियों ने आज प्रातः काल 4:33 मिनट पर बहुत प्रभावशाली दिव्य शक्तियाँ तुम में, विश्व में और तुम्हारे मस्तिष्क में प्रवेश कर दीं हैं। 

इसका परिणाम तुमने आज देख लिया। तुमने भविष्य में तुम्हारे साथ घटित होने वाली एक बात एक पूरी कहानी के रूप में प्रत्येक चरण में देख ली है। 

वह सत्य है, वह घटना अवश्य होगी क्योंकि हमारे पास भी समय सीमित है। हम तुम्हें वे सारी बातें पूरी बता देंगें जो तुम्हें संसार व लोगों के जीर्णोद्धार के लिए करनी है। 

अब से तुम त्रिकालदर्शी ही नहीं परन्तु आने वाली महत्वपूर्ण घटना को, जो तुम्हें कार्य करने हैं उसके लिए उसका एक अंश नहीं, परन्तु सारा सत्य अपने मन में दिखेगा। 

विश्व में आगे क्या होने वाला है ? भारत का भविष्य क्या है? लोगों के मन में तुमसे छुपे कौन से विचार हैं? वे तुम सब सहजता से बिना ध्यान के भी जान जाओगी। इन्हें जानकर तुम्हें अपने कार्य में सफलता मिलेगी। 

तुम्हारे प्रचुर बलिदान व त्याग के बदले में तुम्हें ईश्वर ने ये सिद्धियाँ दीं हैं। तुमसे कोई सत्य छुपा नहीं सकेगा। वे चाहे कितने भी चतुर-सयाने क्यों न बनें, तुम उनका मन पढ़ लोगी। 

अब तुम्हें आगे क्या करना है हम तुम्हें समय-समय पर बताते रहेंगे। तुम हमसे हर क्षण मन से जुड़ी रहती हो। एक क्षण के लिए भी तुम्हारा मन ध्येय से नहीं हटता चाहे कुछ हो जाए। 

तुम्हारे मन में प्रचंड आत्म-ज्ञान का भण्डार है, परन्तु तुम्हारी शब्दावली तुमने बहुत लघु व सीमित रखी हुई है क्योंकि तुम्हें शब्दों के पार रहना प्रिय है। तुम अनुभूतियाँ, अनुभव पसंद करती हो। 

तुम्हें दीर्घ काल से आत्म अनुभूति की इच्छा रही है। यह शुभ इच्छा है। मनुष्य को मन में यह इच्छा अपने अंदर अपनी चेतना में जगानी चाहिए, नहीं तो माया हर लेती है। 

इस जन्म में तुम स्वयं को छुपाओ मत, तुम लोगों को सत्संग में, लेखों में, वार्तालाप में विवेक, प्रबुद्धता का संचार करो, आत्मा में सब निर्धन पड़े हैं। 

आज संसार में सब धन, सत्ता, विषय-वासना, सम्मोहन व राग-द्वेष की आग में जल रहे हैं। वे सब निर्धन हैं। तुम्हारी आत्मा ईश्वर की इच्छा से, ब्रह्म प्रकाश से दैदीप्यमान है, तुम सबके दीपक जलाओ!”

ॐ 

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