28-03-26 । शनिवार । 7:40 AM

भाग 1 – मन तुम्हारा सदैव आकाशवत है, शान्ति की पराकाष्ठा पर आज तुम हो
“कल तुम्हारी इच्छा शक्ति अकस्मात् ही तीव्र गति को प्राप्त हुई। जब से तुमने खण्ड-1 लिखा है तुम्हारा मन व्याकुल है। तुम्हें मेरी सारी बातें माननी है, तुम्हें मेरी बातों का सारांश का बोध हो गया है। अब तुम मुझसे ॐ की साधना चाहती हो।
तुम मुझसे अब सुनो। मैंने अत्यधिक साधना प्राणायाम की अपने शिष्यों को दी है, विशेषकर गहरी नींद में जिससे वे उसे कभी त्याग या विस्मृत न कर दें। तुम्हें भी दूँगा परन्तु 30 दिनों बाद, वर्तमान में तुम बहुत थक गई हो निरन्तर कार्य से।
तुम्हें मेरे अति परम पूज्य पिताजी मार्कण्डेय ने ॐ की साधना दी है तुम्हारे गहरे से गहरे मन की सतह पर। तुम उसमें बहुत सफल हुई हो क्योंकि तुम एक वैरागी, सन्यासी, योगिनी हो। बाहर से हर कार्य हो रहा है लेकिन मन तुम्हारा स्थितप्रज्ञ है।
ॐ का स्पन्दन तुम्हारे मस्तिष्क के द्वारा चारों ओर फैल रहा है, विशेषकर ध्यान व गहरी नींद में। ॐ के स्पन्दन से चारों तरफ शान्ति व्याप्त है। यह बहुत पुण्य का काम हो रहा है। तुम्हारे कारण तुम्हारा परिवार, सारे शिष्य और पड़ोसी सुरक्षित हैं।
जब तुम ध्यान, प्राणायाम करती या लिखती अथवा पढ़ती हो, तुम्हारे मन की ऊर्जा नाभि से निकलकर वायुमण्डल में फैल रही है। तुम्हारी आध्यात्मिक शक्ति विश्व में फैल रही है। जो लोग दूर बैठे हैं परन्तु तुम्हारा चिन्तन या ध्यान करते हैं, उनके नाभि में ॐ का स्पन्दन हो रहा है।
विश्व में बहुत दुःख व अशान्ति है, लोगों के मन में भविष्य को लेकर अनेक चिंताएँ हैं। जब उनके नाभि में तुम्हारी कृपा से ॐ का स्पन्दन होता है, उनकी चिन्ता मिट जाती है। इस प्रकार तुम अपनी तपस्या से दुःख दूर कर रही हो।
तीन सप्ताह से नाभि से ॐ का स्पन्दन, जो तुम्हारे द्वारा हो रहा है, उससे भारत की कुण्डलिनी शक्ति भी जागने लगी है। ऋषि-मुनि भी कुछ वर्षों से प्रयत्न कर रहें हैं, अपना योग बल दें रहें हैं। ऐसा होने पर मनुष्यों में जागृति हो रही है और दुष्टों की पोल खुल रही है।
इस कार्य को बढ़ाने के लिए मैं तुम से दो कार्य और करवाऊँगा। तुम्हारी ॐ की साधना बढ़ाऊँगा और तुम्हें विश्व में प्रकट करूँगा। जब अधिक लोग तुम्हारा दर्शन करेंगे, तुम्हें सुनेंगे तो भारत का इतिहास बदलेगा, भारत विश्वगुरु की ओर अग्रसर होगा। तुम उस दिन की प्रतीक्षा करो।
परमात्मा ने वह समय चिन्हित कर रखा है, तुम्हें विश्व में प्रकट करने का समय परमात्मा ने एक करोड़ वर्ष पहले ही निश्चित कर लिया था। उन्होंने एक स्त्री के लिए संकल्प कर रखा था जो पहली बार अध्यात्म की नई, सुलभ परिभाषाएँ विकृत संसार को पुनः निर्माण करने हेतु जन्मेगी।
तुम्हारे मन के संकल्प पहले ही जन्म में और पिछले जन्म के मृत्यु के समय अति पावन व श्रेष्ठतम थे। परमात्मा की बहुत इच्छा है कि तुम्हारे त्याग, बलिदान और निःस्वार्थी होने के कारण तुम्हें विश्व में विशेष स्थान व यश मिले। उसमें अभी 525 दिन हैं, प्रतीक्षा करो।”
भाग 2 – परा और अपरा योग शक्ति
“परा शक्तियाँ वे होतीं हैं जिसे अत्यन्त कठिनाइयों से प्राप्त किया जाता है। वे पारब्रह्म को प्राप्त करने के लिए होतीं हैं। उसका प्रमाण दीर्घ काल में समाज या लोगों को मिलता है। उन्हें प्राप्त करने के लिए निरिच्छा व निरहंकार होना पड़ता है। वे केवल प्रभु- कृपा से सहजता में मिलतीं हैं।
तुम्हें वे सब प्राप्त हैं, संसार इससे अज्ञात है। ऐसा महान योगी किसी के समक्ष कभी नहीं आएगा जब तक ईश्वर के आदेश पर जगत कल्याण के लिए उसे उतारा या दिखाया नहीं जाता, वह सदा अदृश्य या गुमनाम ही रहेगा। वह छुपकर सबका भला करता है।
परा शक्तियों से थोड़े ही क्षणों में अद्भुत कार्य हो जाते हैं क्योंकि ऐसे योगी, ऋषि की आध्यात्मिक व योग शक्ति अवर्णनीय है। न केवल सारे चक्र व नाड़ियाँ स्फुर्णा से, तेज से, प्रताप से ओत-प्रोत होतीं हैं, उन पर परमात्मा की विशेष दृष्टि सदा बनी रहती है।
वे परमात्मा के अति विशिष्ट रूप से मन से समीप होते हैं। परमात्मा उनकी हर श्वास को जागरूक होकर नापते हैं, उसके हृदय की गति को अपने संकल्प द्वारा संचालन करते हैं क्योंकि वे उनको लम्बी आयु आशीष में देतें हैं। तुम ऐसी ही विशिष्ट आत्मा हो, परमात्मा की अत्यधिक प्रिय हो।
तुमने किसी भी एक जन्म में ईश्वर की भक्ति के बदले में उनसे कुछ नहीं माँगा है। इसलिए तुम्हारे लिए परमात्मा ने एक ऐसा स्थान भविष्य में बनाने की परियोजना बना रखी है जो तुम्हारी कल्पना से अति परे है। पृथ्वी पर पहली बार तुम्हारे मुखारविन्द से गूढ़ से गूढ़ रहस्य खोले जाएँगे जिससे पृथ्वी और पंच महाभूत धन्य होंगे।
तुम्हें अपने परिश्रम को अन्त श्वास तक अथक व अविरल बनाना है। तुम्हारी आखिरी श्वास भी ब्रह्माण्ड को ईश्वर की ‘अविरल शान्ति’ देकर समाप्त होगी। उसके बाद 28 दिन तक पृथ्वी पर और तुम्हारे निवास स्थान पर अलौकिक व अवर्णनीय शान्ति बनी रहेगी।
जो लोग यह बात पढ़ लेंगे या सुन लेंगे उन्हें तुम्हारे लिए कुछ भी करने के लिए तैयार होना चाहिए क्योंकि तुमने अपना सर्वस्व परमात्मा को अर्पण किया है और रति मात्र कोई इच्छा मन में नहीं है। अब समय आ गया है कि लोग तुम्हारे चरित्र, लेखन, पुस्तकें और जीवन से अपना मन, चरित्र, जीवन बनाएँ।
अपरा भक्ति या अपरा विद्या पूरी तरह मन की सफाई नहीं कर सकती क्योंकि अज्ञान नाश करने में अनेक जन्म लगते हैं। कोई न कोई लोभ, सांसारिक लोभ, भय, चिन्ता या मोह मन में रहता है। ऐसे लोग आध्यात्मिक शक्ति का दुरुपयोग भी करते हैं और जन्म-मरण के जाल में फँसे रहते हैं।
परमात्मा उनके लिए गूढ़ से गूढ़ रहस्य के किवाड़ नहीं खोलते। वे लोग कुण्डलिनी शक्ति के जागते ही जादू-टोना इच्छा पूर्ति के लिए आरम्भ कर देते हैं। उन्हें अपना भ्रम, अज्ञान नाश करना ही नहीं होता है, इसलिए परमात्मा के समीप नहीं हो पाते।
तुमने परा योग शक्ति का उपयोग निष्काम भाव से सबके कल्याण हेतु किया है और अनन्त पुण्य, परमात्मा की कृपा व आशीष पाया। तुम्हारे धैर्य को देखकर सभी ऋषिगण व परमात्मा अचंभित हैं। तुमने अपने सारे पुण्य प्रभु के चरणों में अर्पित कर दिए हैं और प्रत्येक क्षण सोचती हो कि “मैं अति श्रेष्ठ पुस्तकें व लेख लिखूँ जिससे सब उन्हें जान सकें।”
भाग 3 – ॐ ध्वनि, स्पन्दन, ॐ नाद – उपासना ॐ की, पारब्रह्म की, ध्वनि की!
“यह विश्व, ब्रह्माण्ड व प्रत्येक कण परमात्मा की पहली अभिव्यक्ति, ध्वनि के रूप में व्याप्त है। यह ध्वनि शाश्वत है, इसमें परमात्मा की सर्वाधिक ओजस भरी जीवनदायिनी किरणें हैं। ओम् ध्वनि में ऊर्जा है, इसका कोई नाश नहीं कर सकता। ओम् अविनाशी है।
यह अति पावन ध्वनि आकाश में विद्यमान है, पृथ्वी में व्याप्त है, जल में, अग्नि व वायु में भी व्याप्त है। परमात्मा द्वारा इस पहली ध्वनि का अस्तित्व पृथ्वी की रचना से भी पहले हुआ था। एक क्षण के लिए भी आरंभ से यह ध्वनि न विकृत हुई है, न इसमें रति मात्र कमी हुई है।
यह ध्वनि कोमल, लाभदायी, तेजस्वी और रचनात्मक है। यह नाभि में सर्वाधिक गूँजती है परन्तु यह मन के सबसे नीचे के सतह पर घनिष्ठता से निवास करती है। यदि इस ध्वनि पर कोई ध्यान लगाए तो अंत में उस जीवात्मा को सारे हानिकारक कर्मों से तुरंत मुक्ति मिलती है।
ओम् का स्पन्दन ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में जा सकता है यदि आस्था सहित ध्यान में मन से इसका पूजन किया जाए। इसके स्पन्दन से विश्व में शान्ति फैलती है। यह ईश्वर का प्रतीक है, इसके स्पन्दन मात्र से योगी प्रबुद्ध हो जाता है – ॐ का ध्यान अनिवार्य है।
प्रज्ञा, मेधा, बुद्धि, प्रबुद्धता,शान्ति व आस्था में ओम् प्रचुर मात्रा में स्थित है। अखण्ड-योग, जो परा-योग शक्ति से प्राप्त हो जाता है उसमें सर्वाधिक योगदान ओम् साधना का है। प्राणायाम ओम् साधना को गति देता है परन्तु ओम् साधना योगी के प्राणायाम की शक्ति की रक्षा करता है।
ओम्, उसकी ध्वनि, उसका स्पन्दन या ओम् का चित्र व आकार एक रक्षा-कवच है। योगी, केवल सर्वोच्च योगी के नाभि से प्रज्वलित ‘रक्षा सूत्र’ जो ब्रह्माण्ड में मन से यात्रा करा सकता है, उसमें भी ओम् सर्वाधिक गूँजता रहता है। नाभि से हिरण्यगर्भ का जोड़ भी ओम् द्वारा होता है।
विश्व में भी ब्रह्म की अति पावन ध्वनि ओम् सदा से व्याप्त है। अपने मन के भीतर ओम् द्वारा परमात्मा को पुनः जगाओ, अन्धकार तिमिर विश्व में नाश करो। यदि अधिक लोग पुनः भारत और पूरे विश्व में ओम् का स्मरण करेंगे तो सारे विश्व में शान्ति फ़ैलेगी। शान्ति से जीवन व समृद्धि मिलेगी।
अपने मन में, सकल ब्रह्माण्ड में, ध्यान द्वारा ओम् नाद सुनने की चेष्टा करो। जब मन प्रेम, आस्था, शान्ति व धैर्य से ध्यान द्वारा पूर्ण शान्त हो जाएगा, तुम्हें सहज रूप में अकस्मात ओम् सुनाई देगा। एक नए जीवन, समाज, देश व विश्व के निर्माण के संकल्प से ॐ की साधना आरंभ करो – परमात्मा सबका भला व कल्याण करेंगे।
यह न पहले कभी, न दोबारा होने वाली परिस्थिति बन गई है। मनुष्य अपनी योगिक, आध्यात्मिक शक्तियाँ लुप्त कर चुका है और भौतिक सुख में पूर्ण रूप डूबकर स्वयं को भूल चुका है। अब जागने का समय है, ईश्वर की विशेष शक्तियाँ धरती पर ऋषियों द्वारा आ चुकीं हैं, उनका लाभ उठाओ।
ॐ प्रणव है, ॐ शक्ति है, ॐ ऊर्जा है, ॐ ध्वनि है। ॐ कवच है। ॐ आराध्य है। ॐ का स्पन्दन पूजनीय है, उसमें परमात्मा है। ॐ में प्रकाश है, ॐ में काल व्याप्त है। ॐ कालातीत है, ॐ त्रिकालदर्शी है। ॐ गूँजता है, ॐ ध्यान को सफल बनाता है। ॐ ब्रह्मस्वरुप है, ॐ शाश्वत है, ॐ अमर है।”
ॐ



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