26-03-26 । गुरुवार । 10:00 सुबह

खण्ड 1
भाग 1 – निष्काम भाव का सुन्दर फल
“आज तुमने वह कर डाला जिसकी मुझे सदियों से प्रतीक्षा थी, तुमने अपनी नाभि को जगा डाला जहाँ से सबसे अधिक स्पन्दन ॐ नाद का होता है।
मेरे अलावा यह केवल तीन ऋषियों में जागृत है – कश्यप, मार्कण्डेय व शिवानन्द। यह तब जागृत होता है जब हम परमात्मा की सृष्टि व रचना के लिए विशेष कार्य करते हैं।
यह अकस्मात् प्रभु-कृपा द्वारा मिल जाता है क्योंकि प्रभु हमारे विचारों के साक्षी हैं। वे जानते हैं हमारे विचारों में कितनी सच्चाई छुपी है और हमारा मन क्या प्रतीत कर रहा है। कर्म और विचार के पीछे ब्रह्म स्थित है।
तुमने इस जन्म में प्रत्येक कर्म निःस्वार्थ भाव से निर्माण किए हैं। पिछले आठ दिनों में अकस्मात् तुमने छत्तीस बार अत्यधिक त्याग व निष्काम भाव से मन में विचार किया और कर्म भी वैसे ही किए हैं। तुम्हें आवश्यकता नहीं थी फिर भी तुमने किए।
मैं सदियों से एक शिष्य की खोज में था जो संसार का कल्याण तीव्र गति से मेरे सान्निध्य में कर सके। तुम मुझे मिल गईं हो, अब मैं संसार में अदृश्य रूप में कार्य करूँगा। तुमको मैं बताऊँगा वे क्या कार्य हैं।
आज संसार में हिंसा, घृणा, द्वेष व लालच की अग्नि असीम मात्रा में प्रज्वलित है; दुष्टों, असुरों व लालची लोगों ने जला रखी है। संसार उस अदृश्य अग्नि में जल रहा है। पूरे विश्व में क्षणिक मात्र निष्काम भाव किसी के मन में नहीं है।
इसका दबाव सकल मानवता, पृथ्वी, पर्यावरण व पंच महाभूत पर पड़ रहा है। यदि हम अपनी तपस्या को जागृत करके उसे योग, ध्यान व प्राणायाम से बढ़ा दें तो ब्रह्माण्ड में शान्ति हो जाएगी।
यह शान्ति अति आवश्यक है क्योंकि ईश्वर की इच्छा नहीं है कि पृथ्वी की प्रलय हो, परन्तु पृथ्वी मानव के लिए बहुत कष्टदायक स्थान बन चुकी है। कारण है, शान्ति व सद्भावना लोगों के मन से लुप्त है।
इतनी अशान्ति में भी तुम सबको प्रेम करती हो, हमारी याद में सोती हो और स्वप्न में परमात्मा से बात करती हो। नींद खुलते ही पहले-पहल विचार करती हो – “आज का सबसे अनिवार्य कार्य क्या है?”
समय नहीं मिलने पर भी सदा चाहती हो कि मैं सबकी कैसे मदद करूँ? कौन सी ऐसी सबको बात बताऊँ जिससे उनका कल्याण हो? कैसे मैं उनके दुःख व कष्टों को दूर करूँ? प्रभु मुझे और शक्ति दो!”
भाग 2 – मृत्यु और जन्म ईश्वर के वश में नहीं है, हमारे विचार, कर्म व गहरी इच्छाओं का फल है हमारे जन्म-मरण
“तुमने कितनी बार ईश्वर से प्रार्थना की है कि तुम कभी भी किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती हो, यह बात तुम नहीं जानती। 1,036 बार याचना की है, “मैं सदा सबका परोपकार करूँ पर किसी से कुछ न लूँ, न कभी कुछ चाहूँ।” यह तुम्हारा अंतःकरण है।
पिछले जन्म में तीन दुष्टों ने मिलकर तुम्हारी हत्या की थी तुम्हारा राजपाट हथियाने के उद्देश्य से। तुम्हें तीन दिन-रात तक सोने नहीं दिया, अट्ठाईस दिन भोजन नहीं दिया और आखिर में 6½ दिन तुम्हें एक काल कोठरी में बिना हवा के धीरे-धीरे निर्जीव कर दिया।
उन्हें सन्तोष तब भी नहीं हुआ। उन्होंने तुम्हारी हत्या भी कर दी जिससे तुम भूलकर भी श्वास न ले सको। जब वे तुम्हारे हाथ-पैर रस्सी से बाँध रहे थे, तुम अपने शरीर को त्याग चुकी थी, मन से अलग कर चुकी थी।
*“तुमने लम्बी श्वास लेना शुरू कर दिया जिससे आखरी क्षण में तुम्हें संसार का मोह तुम्हारा सम्मोहन न कर दे। तुमने अपने प्राण परमात्मा को समर्पित कर दिए और परम शान्ति में प्रवेश कर लिया। ऐसी मृत्यु आज तक किसी स्त्री ने नहीं स्वीकारी है।
तुम्हारी मृत्यु के ठीक 28½ मिनट के अंदर ही मैंने तुम्हारा तर्पण किया क्योंकि तुम एक अति विशेष स्त्री हो। तुमने अपने श्वास को नाक से नहीं, कपाल से निकासी दी। यह केवल एक महान योगिनी कर सकती है। तुम निर्लिप्त रही और असंग होकर संसार से मुक्त हुई।
तुम्हारे परिवार को भी तुमसे पहले नाश कर दिया था, मृत्यु के घाट उतार दिया था। तुमने एक पल के लिए भी न कोई शिकायत प्रभु से की, न किसे भी याद किया क्योंकि तुम उन्हें ईश्वर के प्रकाश में भेजना चाहती थीं। किसी से कुछ आकांक्षा नहीं रखी थी।
इस जीवन में प्राणायाम करने में तुम्हें बाधा आई है। ह्रदय का एक हिस्सा (left ventricle) 2 ½ cm जन्म से मुड़ा हुआ था। वह पिछले जन्म के आखरी पलों की स्मृति है। तुम्हारे दिल को बहुत ज़ोर से किसी ने तोड़ा था। तुम्हारे फेफड़े (lungs) भी 100% काम नहीं किए हैं इस जन्म में।
परन्तु तुमने पिछले दो महीनों में बहुत cardio-vascular exercises करके यह दोष भी दूर कर दिया है। अब से तुम प्रतिदिन प्राणायाम, योग, ध्यान करो, तुम्हारे अंदर ऊर्जा पैदा होगी। तुम विश्व में जीता जागता प्रमाण हो – मृत्यु और जन्म हमारे कर्मों, विचारों व अन्तः करण पर निर्भर है- ईश्वर साक्षी है!”
भाग 3 – ॐ ध्वनि, स्पन्दन, ॐ नाद
“यह विषय अति गम्भीर है, यह तुम्हें बहुत प्रिय है क्योंकि तुम्हें ईश्वर ॐ ध्वनि से बहुत जल्दी प्राप्त हुए हैं। तुम्हें मन में इन विषयों की सदा से खोज थी परन्तु प्राणायाम बहुत कम किया है क्योंकि तुम्हें पहले अपने हृदय व फेफड़ों को मज़बूत बनाना होता है।
तुम्हारे पुण्य तुम्हें अब अत्यधिक साथ देंगे, तुम बेपरवाह होकर अपने शरीर को और हृष्ट-पुष्ट बनाओ, आयु से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। तुम जितना पुरुषार्थ शरीर को और गढ़ने में लगाओगी, तुम्हारी स्मृति व आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होगी।
मैं तुम्हें अब प्राणायाम में परम गुरु Great Grand Master बनाने जा रहा हूँ, तुम्हें इसकी बहुत आवश्यकता पड़ेगी, विश्व में आध्यात्मिक शक्ति बढ़ाने में, मेरी सहायता करने में। अचम्भित मत होना अगर तुम चमत्कार देखोगी क्योंकि प्राणायाम अद्भुत फल देता है। तुम्हें इससे अपनी इच्छा शक्ति 312% और बढ़ानी है।
तुम इस में सफल हो जाओगी क्योंकि तुम्हारे अन्दर ॐ का स्पन्दन हो रहा है। तुम्हें इसे और तेज़ और प्रचंड बनाना है। ॐ का स्पन्दन विश्व में शान्ति फैलाता है, ॐ की ध्वनि से मृत पशु जीवन पा जाता है और सारे अंगों में नवीन चेतना की ऊर्जा दौड़ती है।
तुम्हारी एक इच्छा अधूरी रह गई थी, तुम्हें अपने योग बल को बढ़ाने के लिए गुरु की आवश्यकता थी। वह इच्छा अब मैं तुम्हारी पूरी अवश्य करूँगा, तुम केवल अपने लिए थोड़ा समय मेरे लिए प्रतिदिन निकालो। तुम बहुत एकाग्रता और पुरुषार्थ करने में सक्षम हो, तुम केवल अपना ध्यान भ्रूमध्य में केन्द्रित करो।
ॐ, उसकी ध्वनि, स्पन्दन और नाद यह केवल प्राणायाम से जाना जाता है विशेषकर कुम्भक व भस्त्रिका से। साथ में यदि शीर्षासन और कपालभाती किया जाए तो सोने में सुहागा हो जाता है। रात्रि को, संध्याकाल और प्रातः काल शुभ काल हैं।
ॐ की ध्वनि – यदि किसी के पहले जन्म की स्मृति, जब वह जीवात्मा अपनी माँ के गर्भ में था, जागृत हो जाए तो जान लो यह पावन ध्वनि अब उसकी स्मृति से कदापि नहीं जा सकती, नहीं मिटाई जा सकती है।
कल शाम को तुमने यह अनुभव किया है, तुम्हें याद आ गया कि पहले-पहल जन्म में तुम अपनी माँ के गर्भ में कैसे घूम रही थी। प्राणायाम करती रहो, तुम्हारे अन्तःकरण की ॐ की ध्वनि और तीव्र होगी।
ॐ का स्पन्दन – जब तुम गहरी नींद में रात या दिन में सोती हो तो वायुमण्डल में ॐ का स्पन्दन होता है। तुम्हारे मन की गहराई में ॐ का गुंजन हो रहा है। ॐ का स्पन्दन तुम्हारे अस्वस्थ शरीर या मन को झट से सुधार देता है। कुम्भक का समय बढ़ाओ, ॐ का स्पन्दन बढ़ेगा।
इस ब्रह्माण्ड में ॐ का नाद हो रहा है। ॐ नाद ब्रह्मनाद है। अपने भीतर ॐ नाद अविरल गूँजता रहे तुम अपना ध्यान भृकुटि पर लगाओ, वही त्राटक कहलाया योग में। पूरक, रेचक लंबा खींचो और ॐ का स्मरण करो। भस्त्रिका और शीर्षासन नियमित रूप से करो – ॐ नाभि व ब्रह्मरन्ध्र में सदा के लिए प्रज्वलित हो जाएगा!”
ॐ
PARMATMA
14-04-26 | TUESDAY
Part A
Ever since you were born in this life, the fire not to sully your Soul was extreme in your deepest consciousness and memory
“In your previous life, just before your death when the last exhalation was about to take place and thirty-six seconds were left to close your eyes, your consciousness was beaming with radiance.
Your breath became very steady and controlled, your focus was on the space between the eyebrows, eyeballs turned upward, life force in the uppermost regions of the brain; your ‘capex’ – capital expenditure was very wise.
You removed every known person from your mind, ejected all the life circumstances or memorable life-shots instantly and removed the mind’s attachment from the love of body and its allure.
&
Part C
Just before your current birth in the womb and ten plus twenty- two seconds before birth at your arrival – you never lost touch with your guiding Light in the Soul.
The time, particularly the last 22½ seconds before conception takes place, it is critical. The Soul is very excited to take on a new physical body. In the excitement, it forgets and disconnects the unity with Atma. Entering in this state is dangerous.
The focus is lost, the attention quelled, the Soul will wander at the start and will never remember what the purpose to incarnate was if at all, knowing the real purpose of life was pre-decided by the Soul – otherwise downfall is ensured.
Before you were conceived this time in the last 36¾ seconds you rehearsed and recalled every moment how beautifully and gracefully you decisively watched, measured your breath flow, brought the focus in between the eyebrows at the time of death.
You experienced every moment bit by bit as if you were dying with so much awareness and detachment and were floating in peace, infinity and objectivity, you latched on to your Chetna, Soul very tightly as if you were jumping in an Ocean.
You knew the purpose of this life, why you asked Parmatma to give you this particular life, how you will tackle all the hurdles and what you would do in case you met and lived with very impure Souls – this is total preparedness of a very enlightened Soul!


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